पर्यावरण प्रदूषण : कानून

पर्यावरण प्रदूषण : कानून और क्रियान्वयन

भारत में पर्यावरण कानून का इतिहास 125 वर्ष पुराना है। प्रथम कानून सन् 1894 में पास हुआ था, जिसमें वायु प्रदूषण नियंत्रणकारी कानून थे। वर्तमान समय में पर्यावरण संरक्षण एक जटिल समस्या है तथा वह संपूर्ण विश्व के लिए चुनौती है। आज का बढ़ता हुआ प्रदूषण संपूर्ण मानव-जाति के लिए अभिशाप बन गया है। मानव के अतिरिक्त वन एवं वन्य जीव प्रदूषण से त्रस्त हैं। इसी कारण संविधान में पर्यावरण संरक्षण पर विशेष बल दिया जा रहा है तथा इस समस्या से निपटने के लिए समय-समय पर कई कानून भी बनाए गए हैं।भारत ही नहीं पूरा विश्व पर्यावरण के इस बिगड़ते स्वरूप से प्रभावित है विकासशील व अविकसित देश इस समस्या से अधिक प्रभावित हुए, क्योंकि एक तो उनकी अपेक्षाकृत भारी जनसंख्या, दूसरा आर्थिक अभाव, तीसरे अशिक्षा अथवा कम शिक्षा उन्हें इस संकट से सहज छुटकारा नहीं दिला सकती। आम जनता ने पहले प्रगति के नाम पर प्रशासन से और फिर कानून से संरक्षण चाहा। प्रगति के नाम पर प्रशासन स्वयं भी कहीं इस समस्या के उत्पन्न करने के कारणों से जुड़ा था। अतः वह कुछ कर न सका। हां, कानून ने राहत दी। विद्वान न्यायाधीशों और विधिवेत्ताओं ने आम नागरिक के लाभ के लिए जहां भी कानून में कुछ मिला, उसी से जनता को लाभ पहुंचाया। यहां तक कि भारत के संविधान की धाराओं में उनके हित में बहुत खोजकर उनका उपयोग किया।

पर्यावरण में कानून की आवश्यकता वस्तुतः आम नागरिक को दैनिक जीवन के लिए मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति, उनकी शुद्धता, प्रदूषण को रोकने तथा आगे न होने देने और विकृत पर्यावरण को सुधारने के लिए ही महसूस हुई। अतः पर्यावरण संरक्षण तथा प्रदूषण रोकने हेतु अनेक पिछले वर्षों में बने।

पर्यावरण को सुरक्षा प्रदान करने के लिए ब्रिटिशकाल में भी कुछ कानून बने थे, किंतु स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारतीय संविधान में पर्यावरण संरक्षण संबंधी 40वां संविधान संशोधन इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम था। इसके अनुच्छेद 48ए के अनुसार सरकार देश के पर्यावरण संरक्षण और सुधार तथा वन एवं वन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगी। 42वें संविधान के अच्छेद 51ए (जी) के अनुसार भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करें और उनका सुधार करें तथा प्राणीमात्र के प्रति दया-भाव रखें। भारत सरकार द्वारा सन् 1980 में पर्यावरण मंत्रालय की स्थापना की गई।

जून, 1972 संपन्न मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र संघ के स्टॉक होम में अधिवेशन के अनुसार, ‘मनुष्य अपने पर्यावरण का निर्माता एवं शिल्पकार दोनों ही है, जिससे उसे भौतिक स्थिरता मिलती है तथा बौद्धिक, नैतिक सामाजिक तथा आध्यात्मिक विकास का सुअवसर प्राप्त होता है।’ इस ग्रह पर मनुष्य जाति की एक लंबी तथा पीड़ादायक उत्क्रमण यात्रा में एक ऐसी स्थिति आ गई है, जब विज्ञान तथा तकनीक के तीव्र विस्तार द्वारा मनुष्य ने एक प्रकार से अपने पर्यावरण की कायापलट करने की क्षमता प्राप्त कर ली है। पर्यावरण प्रबंधन के लिए अनेक कानूनी प्रावधान बनाए गए हैं, जिनकी मुख्य भूमिकाएं हैं-

कानून पर्यावरण को क्षति पहुंचाने वाले व्यक्ति को दंडित करता है।
कानून पीड़ित को क्षतिपूर्ति दिलवाता है।
कानून व्यक्ति की पर्यावरण पर दबाव बढ़ाने से वर्जित करता है।
कानून पर्यावरण संरक्षण नीति को कार्य रूप में परिमत करता है।
कानून विकास नीति को भी कार्य रूप में परिणत करता है।

भारत में पर्यावरण कानून का इतिहास 125 वर्ष पुराना है। प्रथम कानून सन् 1894 में पास हुआ था, जिसमें वायु प्रदूषण नियंत्रणकारी कानून थे। वर्तमान समय में पर्यावरण संरक्षण एक जटिल समस्या है तथा वह संपूर्ण विश्व के लिए चुनौती है। आज का बढ़ता हुआ प्रदूषण संपूर्ण मानव-जाति के लिए अभिशाप बन गया है। मानव के अतिरिक्त वन एवं वन्य जीव प्रदूषण से त्रस्त हैं। इसी कारण संविधान में पर्यावरण संरक्षण पर विशेष बल दिया जा रहा है तथा इस समस्या से निपटने के लिए समय-समय पर कई कानून भी बनाए गए हैं।

कानूनी स्थिति (Legal Status)


प्रदूषण से पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए संसार के कई देशों ने कानून को विनियमित करने के लिए विभिन्न प्रकार के प्रदूषण के साथ ही प्रदूषण के प्रतिकूल प्रभाव को कम करने के लिए कानून बनाए हैं। पर्यावरण कानून का प्रमुख उद्देश्य वातावरण के प्रमुख उपहार को प्रदूषण से मुक्त रखना है। भारतीय समाज धार्मिक प्रवृत्ति का होने के कारण यहां प्राकृतिक संसाधन (पौधे, जंतु, नदियां) पूजे जाते हैं। इसी कारण प्राचीनकाल में पर्यावरण रक्षा के लिए कानून नहीं बना था, लेकिन पिछली सदी से पर्यावरण को बचाने के लिए बड़ी संख्या में कानून बनाए गए। ये सभी कानून तीन श्रेणियों में बांटे जा सकते हैं-

सामान्य कानून,
विनियामक कानून और
विशेष विधान।

1. सामान्य कानून (Common Laws) – सामान्य कानून इंग्लैंड के परंपरागत कानून की व्याख्या है। यह न्यायिक निर्णयों पर आधारित है और अभी तक लागू है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 372 कॉमन लॉ पर आधारित है। इस कानून के अंतर्गत किसी भी कार्य के विरुद्ध जो किसी संपत्ति या व्यक्ति की हानि का कारण बना हो, प्रभावित पक्ष क्षतिपूर्ति या निषेधाज्ञा या दोनों का दावा कर सकता है।

पर्यावरण प्रदूषण के लिए निम्न तीन कारक जिम्मेवार हैं-

(क) व्यवधान,
(ख) अतिक्रमण,
(ग) लापरवाही।

2. विशेष विधान (Specific Legislations) – जल एवं वायु प्रदूषण।

संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Provisions) –भारतीय संविधान विश्व का पहला संविधान है, जिसमें पर्यावरण के लिए विशिष्ट प्रावधान है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना यह सुनिश्चित करती है कि हमारा देश समाजवादी समाज की अवधारणा पर आधारित है, जहां राज्य व्यक्ति की अपेक्षा सामाजिक समस्याओं को प्राथमिकता देता है। समाजवाद का मूल लक्ष्य है, सभी को जीवन का सुखद स्तर उपलब्ध करवाना, जो केवल एक प्रदूषण मुक्त वातावरण में ही संभव है।

3. प्रदूषण नियंत्रण कानून (Pollution Control Legislation)- भारत में प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए निम्न कानून बनाए गए हैं-
भारत में पर्यावरण कानून का इतिहास 125 वर्ष पुराना है। प्रथम कानून सन् 1894 में पास हुआ था, जिसमें वायु प्रदूषण नियंत्रणकारी कानून थे। वर्तमान समय में पर्यावरण संरक्षण एक जटिल समस्या है तथा वह संपूर्ण विश्व के लिए चुनौती है। आज का बढ़ता हुआ प्रदूषण संपूर्ण मानव-जाति के लिए अभिशाप बन गया है। मानव के अतिरिक्त वन एवं वन्य जीव प्रदूषण से त्रस्त हैं। इसी कारण संविधान में पर्यावरण संरक्षण पर विशेष बल दिया जा रहा है तथा इस समस्या से निपटने के लिए समय-समय पर कई कानून भी बनाए गए हैं।भारत ही नहीं पूरा विश्व पर्यावरण के इस बिगड़ते स्वरूप से प्रभावित है विकासशील व अविकसित देश इस समस्या से अधिक प्रभावित हुए, क्योंकि एक तो उनकी अपेक्षाकृत भारी जनसंख्या, दूसरा आर्थिक अभाव, तीसरे अशिक्षा अथवा कम शिक्षा उन्हें इस संकट से सहज छुटकारा नहीं दिला सकती। आम जनता ने पहले प्रगति के नाम पर प्रशासन से और फिर कानून से संरक्षण चाहा। प्रगति के नाम पर प्रशासन स्वयं भी कहीं इस समस्या के उत्पन्न करने के कारणों से जुड़ा था। अतः वह कुछ कर न सका। हां, कानून ने राहत दी। विद्वान न्यायाधीशों और विधिवेत्ताओं ने आम नागरिक के लाभ के लिए जहां भी कानून में कुछ मिला, उसी से जनता को लाभ पहुंचाया। यहां तक कि भारत के संविधान की धाराओं में उनके हित में बहुत खोजकर उनका उपयोग किया।

पर्यावरण में कानून की आवश्यकता वस्तुतः आम नागरिक को दैनिक जीवन के लिए मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति, उनकी शुद्धता, प्रदूषण को रोकने तथा आगे न होने देने और विकृत पर्यावरण को सुधारने के लिए ही महसूस हुई। अतः पर्यावरण संरक्षण तथा प्रदूषण रोकने हेतु अनेक पिछले वर्षों में बने।

पर्यावरण को सुरक्षा प्रदान करने के लिए ब्रिटिशकाल में भी कुछ कानून बने थे, किंतु स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारतीय संविधान में पर्यावरण संरक्षण संबंधी 40वां संविधान संशोधन इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम था। इसके अनुच्छेद 48ए के अनुसार सरकार देश के पर्यावरण संरक्षण और सुधार तथा वन एवं वन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगी। 42वें संविधान के अच्छेद 51ए (जी) के अनुसार भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करें और उनका सुधार करें तथा प्राणीमात्र के प्रति दया-भाव रखें। भारत सरकार द्वारा सन् 1980 में पर्यावरण मंत्रालय की स्थापना की गई।

जून, 1972 संपन्न मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र संघ के स्टॉक होम में अधिवेशन के अनुसार, ‘मनुष्य अपने पर्यावरण का निर्माता एवं शिल्पकार दोनों ही है, जिससे उसे भौतिक स्थिरता मिलती है तथा बौद्धिक, नैतिक सामाजिक तथा आध्यात्मिक विकास का सुअवसर प्राप्त होता है।’ इस ग्रह पर मनुष्य जाति की एक लंबी तथा पीड़ादायक उत्क्रमण यात्रा में एक ऐसी स्थिति आ गई है, जब विज्ञान तथा तकनीक के तीव्र विस्तार द्वारा मनुष्य ने एक प्रकार से अपने पर्यावरण की कायापलट करने की क्षमता प्राप्त कर ली है। पर्यावरण प्रबंधन के लिए अनेक कानूनी प्रावधान बनाए गए हैं, जिनकी मुख्य भूमिकाएं हैं-

कानून पर्यावरण को क्षति पहुंचाने वाले व्यक्ति को दंडित करता है।
कानून पीड़ित को क्षतिपूर्ति दिलवाता है।
कानून व्यक्ति की पर्यावरण पर दबाव बढ़ाने से वर्जित करता है।
कानून पर्यावरण संरक्षण नीति को कार्य रूप में परिमत करता है।
कानून विकास नीति को भी कार्य रूप में परिणत करता है।

भारत में पर्यावरण कानून का इतिहास 125 वर्ष पुराना है। प्रथम कानून सन् 1894 में पास हुआ था, जिसमें वायु प्रदूषण नियंत्रणकारी कानून थे। वर्तमान समय में पर्यावरण संरक्षण एक जटिल समस्या है तथा वह संपूर्ण विश्व के लिए चुनौती है। आज का बढ़ता हुआ प्रदूषण संपूर्ण मानव-जाति के लिए अभिशाप बन गया है। मानव के अतिरिक्त वन एवं वन्य जीव प्रदूषण से त्रस्त हैं। इसी कारण संविधान में पर्यावरण संरक्षण पर विशेष बल दिया जा रहा है तथा इस समस्या से निपटने के लिए समय-समय पर कई कानून भी बनाए गए हैं।

कानूनी स्थिति (Legal Status)


प्रदूषण से पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए संसार के कई देशों ने कानून को विनियमित करने के लिए विभिन्न प्रकार के प्रदूषण के साथ ही प्रदूषण के प्रतिकूल प्रभाव को कम करने के लिए कानून बनाए हैं। पर्यावरण कानून का प्रमुख उद्देश्य वातावरण के प्रमुख उपहार को प्रदूषण से मुक्त रखना है। भारतीय समाज धार्मिक प्रवृत्ति का होने के कारण यहां प्राकृतिक संसाधन (पौधे, जंतु, नदियां) पूजे जाते हैं। इसी कारण प्राचीनकाल में पर्यावरण रक्षा के लिए कानून नहीं बना था, लेकिन पिछली सदी से पर्यावरण को बचाने के लिए बड़ी संख्या में कानून बनाए गए। ये सभी कानून तीन श्रेणियों में बांटे जा सकते हैं-

सामान्य कानून,
विनियामक कानून और
विशेष विधान।

1. सामान्य कानून (Common Laws) – सामान्य कानून इंग्लैंड के परंपरागत कानून की व्याख्या है। यह न्यायिक निर्णयों पर आधारित है और अभी तक लागू है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 372 कॉमन लॉ पर आधारित है। इस कानून के अंतर्गत किसी भी कार्य के विरुद्ध जो किसी संपत्ति या व्यक्ति की हानि का कारण बना हो, प्रभावित पक्ष क्षतिपूर्ति या निषेधाज्ञा या दोनों का दावा कर सकता है।

पर्यावरण प्रदूषण के लिए निम्न तीन कारक जिम्मेवार हैं-

(क) व्यवधान,
(ख) अतिक्रमण,
(ग) लापरवाही।

2. विशेष विधान (Specific Legislations) – जल एवं वायु प्रदूषण।

संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Provisions) –भारतीय संविधान विश्व का पहला संविधान है, जिसमें पर्यावरण के लिए विशिष्ट प्रावधान है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना यह सुनिश्चित करती है कि हमारा देश समाजवादी समाज की अवधारणा पर आधारित है, जहां राज्य व्यक्ति की अपेक्षा सामाजिक समस्याओं को प्राथमिकता देता है। समाजवाद का मूल लक्ष्य है, सभी को जीवन का सुखद स्तर उपलब्ध करवाना, जो केवल एक प्रदूषण मुक्त वातावरण में ही संभव है।

3. प्रदूषण नियंत्रण कानून (Pollution Control Legislation)- भारत में प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए निम्न कानून बनाए गए हैं-

जल प्रदूषण अधिनियम (The Water Prevention and Control of Pollution Amendment Act)


यह अधिनियम जल प्रदूषण की रोकथाम एवं नियंत्रण के लिए बनाया गया है। इसके माध्यम से बोर्डों का गठन किया गया है, जो जल प्रदूषण की रोकथाम व नियंत्रण करते हैं। अधिनियम द्वारा बोर्डों को अधिकार एवं कर्तव्य प्रदत्त किए गए हैं।

प्रदूषण से तात्पर्य जल का अशुद्धिकरण अथवा उसमें भौतिक, रासायनिक या जीव विज्ञानी परिवर्तन करना है अथवा सीवेज (Sewage) या कोई अन्य औद्योगिक, कृषि या किसी अन्य न्यायसंगत कार्य के लिए अयोग्य या पशु-पक्षी अथवा जलीय वनस्पति के लिए अयोग्य कर दें।

केंद्रिय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में एक पूर्णकालिक सभापित, 5 नामित अधिकारी, 5 नामित राज्य बोर्ड अधिकारी, 3 नामित गैर-सरकारी व्यक्ति, 2 नामित औद्योगिक इकाई प्रतिनिधि तथा 1 पूर्णकालिक सचिव होगा।

राज्य बोर्ड में एक पूर्णकालिक सभापित, 5 राज्य सरकार नामित अधिकारी, 5 नामित राज्य बोर्ड अधिकारी, 3 नामित गैर-सरकारी व्यक्ति, 2 नामित औद्योगिक इकाई प्रतिनिधि तथा 1 पूर्णकालिक सचिव होगा।

सदस्यों का कार्यकाल 3 वर्ष है।

बोर्ड की मीटिंग 3 मास में कम-से-कम एक बार होगी।

केंद्र विशेष कार्यों के लिए कमेटी बना सकता है, जिसमें बोर्ड तथा बाह्य दोनों प्रकार के व्यक्ति सदस्य हो सकते हैं।

केंद्रीय बोर्ड के कार्य-

i. केंद्र सरकार को जल प्रदूषण संबंधी सलाह देना।
ii. राज्य बोर्डों के कार्यों का एकीकरण।
iii. राज्य बोर्डों को जल प्रदूषण जांच और शोध-कार्य में सहायता प्रदान करना।
iv. जल प्रदूषण विशेषज्ञों की ट्रेनिंग।
v. जल प्रदूषण संबंधी जानकारी संचार माध्यमों द्वारा जनसाधारण को प्रदान करना।
vi. संबंधित तकनीकी व सांख्यिकी सूचना एकत्र, एकीकृत एवं प्रकाशित करना।
vii. सरकार की सहायता से जल में मानक करना तथा समय-समय पर उन्हें पुनरीक्षित करना।
viii. जल प्रदूषण रोकने के लिए राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम चलाना।

9. राज्य बोर्ड के कार्य-

i. राज्य सरकार के जल प्रदूषण रोकने के कार्यक्रम का संचालन।
ii. राज्य सरकार को जल प्रदूषण संबंधी सलाह देना।
iii. जल प्रदूषण संबंधी राज्य स्तर पर सूचनाएं एकत्र, एकीकृत एवं प्रकाशित करना।
iv. जल प्रदूषण रोकने के लिए अनुसंधान कराना।
v.विशेषज्ञों की ट्रेनिंग में केंद्रीय बोर्ड की सहायता करना।
vi. सीवेज तथा उत्सर्गों का उपचार की दृष्टि से निरीक्षण करना।
vii. जल प्रदूषण के मानक स्थापित एवं पुनरीक्षित करना।
viii. जल उपचार के कारगर व सस्ते तरीके निकालना।
ix. सीवेज तथा उत्सर्ग के उपयोग प्रयोग ज्ञात करना।
x. सीवेज एवं उत्सर्ग हटाने के उचित तरीके निकालना।
xi. उपचार के मानक स्थापित करना।
xii. सरकार को उन उद्योगों की जानकारी देना, जो हानिकारक उत्सर्ग बाहर छोड़ रहे हों।
10. बोर्ड के सदस्य, अधिकारी या अधिकृत व्यक्ति किसी भी उद्योग से उत्सर्ग जल का नमूना ले सकते हैं।
11. बोर्ड के सदस्य, अधिकारी या अधिकृत व्यक्ति किसी भी उद्योग का निरीक्षण कर सकते हैं।
12. किसी व्यक्ति को जानबूझकर कोई विषाक्त नशीला पदार्थ किसी जल धारा में निर्गत करने का अधिकार नहीं है।
13. नियमों का उल्लंघन करने पर तीन मास की कैद तथा जुर्माने या दोनों का प्रावधान हैं।
14. कंपनियों तथा सरकारी संस्थाओं द्वारा नियमों का उल्लंघन करने पर दंड का प्रावधान है।

पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 (Environment Protection Act,1986)


केंद्र सरकार द्वारा पारित अधिनियम के प्रावधान इस प्रकार हैं-

‘पर्यावरण’ से तात्पर्य जल, वायु भूमि का अंतर्संबध मनुष्य, जीव, वनस्पति, सूक्ष्मजीवी तथा वन-संपदा से है।
‘पर्यावरण’ प्रदूषण से तात्पर्य किसी ठोस द्रव अथवा गैसीय पदार्थ से है, जो इतनी सांध्रता में हो कि पर्यावरण के लिए हानिकारक सिद्ध हो।
केंद्र सरकार के पर्यावरण संरक्षण संबंधी अधिकार-
i. पर्यावरण संरक्षण कार्य में राज्य सरकारों के कार्यों को नियमित करना।
ii. पर्यावरण संरक्षण के लिए राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम का आयोजन एनं निष्पादन करना।
iii. पर्यावरण गुणता के मानक निर्धारित करना।
iv. विभिन्न प्रदूषण स्रोतों से निर्गत होने वाले प्रदूषकों की अधिकतम प्रदूषणकारी सीमा निर्धारित करना।
v. उन क्षेत्रों का निर्धारण करना, जिनमें सुरक्षा उपायों के साथ विभिन्न औद्योगिक संस्थान स्थापित किए जा सकते हैं।
vi. पर्यावरण प्रदूषण के कारण होने वाली दुर्घटनाओं से बचाव के कारगर सुरक्षात्मक तरीके निर्धारित करना।
vii. घातक सामग्री को उठाने-रखने की सुरक्षात्मक कार्यविधि का निर्धारण।
viii. औद्योगिक प्रक्रियाओं, सामग्री आदि का पर्यावरण प्रदूषण की दृष्टि से निरीक्षण।
ix. पर्यावरण प्रदूषण की रोकथाम के लिए शोध कार्य करना।
x. उद्योग संस्थानों, उपकरणों, मशीनरी , औद्योगिक प्रक्रियाओं आदि का निरीक्षण।
xi. पर्यावरण प्रदूषण, शोध प्रयोगशालाओं की स्थापना/मान्यता प्रदान करना।
xii. पर्यावरण प्रदूषण संबंधी सूचना एकत्र, एकीकृत एवं प्रकाशित करना।
xiii. मैनुअल, गाइड बुक, कोड आदि तैयार करना।
xiv. पर्यावरण संरक्षण संबंधी अन्य समुचित कार्य।
4. पर्यावरण प्रदूषक उद्योगों को रोकने का आदेश देने के लिए सरकार सक्षम है।
5. केंद्र सरकार निम्न के मानक स्थापित करने के लिए सक्षम है।i. वायु, जल तथा मृदा के मानक।
ii. विभिन्न प्रदूषकों का अधिकतम अनुमन्य सांद्रण।
iii. घातक पदार्थों के उठाने, रखने के नियम।
iv. विभिन्न स्थानों पर घातक पदार्थों के प्रयोग पर रोक।
v. विभिन्न स्थानों पर उद्योग-धंधे लगाने पर रोक।
vi. दुर्घटना की रोकथाम की कार्यविधि।

6. कोई भी व्यक्ति कोई ऐसा कार्य या उद्योग स्थापित नहीं कर सकता, जिससे निर्गत होने वाला प्रदूषक अनुमन्य से अधिक हो।
7. सरकारी संस्थानों का निरीक्षण करने, नमूने लेने तथा उद्योग कार्य रोकने के लिए सक्षम है।
8. नियमों का उल्लंघन करने पर एक लाख रूपये तक जुर्माना व 5 वर्षा की कैद का प्रावधान है।
9. कंपनियों तथा सरकारी संस्थानों द्वारा नियमों का उल्लंघन करने पर दंड का प्रावधान है।

भारतीय वन अधिनियम, 1927 (Indian Forest Act, 1927)


भारतीय वन अधिनियम सन् 1927 में पारित किया गया था। भारतीय वन (संरक्षण) अधिनियम (Indian Forest Conservation Act, 1980) तथा वन संरक्षण नियम (Forest Conservation Rules, 1981) में पारित हुआ।

इसके नियम इस प्रकार हैं-

1.सन् 1927 में पारित मूल अधिनियम में वन-पशु अधिकारी, वन संपदा, नदी, वृक्ष, लकड़ी इत्यादि की अधिकृत परिभाषा दी गई हैं।2. सन् 1927 के अधिनियम के अनुसार सुरक्षित वन घोषित करने का अधिकार राज्य सरकारों को है।
3. सुरक्षित वनों के अंदर किसी जाति के किसी वृक्ष को राज्य सरकार सुरक्षित घोषित कर सकती है।
4. सुरक्षित वनों के नियमों का निर्धारण भी राज्य सरकारें कर सकती हैं, जो निम्न क्षेत्रों में होंगे-

i. वृक्ष तथा लकड़ी काटने संबंधी।
ii. सहवर्ती ग्रामों के वासियों को वन के भीतर उपलब्ध वन-संपदा को अपने उपयोग के लिए देने संबंधी।
iii. सहवर्ती वनों के भीतर खेती करने संबंधी।
iv. अग्निकांड संबंधी।
v. घास काटने संबंधी।vi. वनों के प्रबंधन संबंधी।
5. वृक्षों को नुकसान पहुंचाने पर छह मास की कैद या/और 500 रुपए तक जुर्माने का प्रावधान है।
6. राज्य सरकारें उद्घोषण द्वारा किसी भी वन का नियंत्रण सुरक्षा की दृष्टि से अपने हाथ में ले सकती हैं।
7. पालित पशुओं (Cattles) द्वारा वन सीमा का उल्लंघन (Trespass) करने पर मालिक पर आर्थिक जुर्माना किया जा सकता है तथा पशु को रोक पर रखा भी जा सकता है।

वन संरक्षण अधिनियम, 1980 (Forest Conservation Act, 1980)


इस अधिनियम में सन् 1988 में संशोधन किया गया था। इसके अनुसार –

राज्य सरकारें सुरक्षित वनों को असुरक्षित अथवा किसी अन्य वन को सुरक्षित घोषित कर सकती है।
सुरक्षित वनों के कुछ भाग आवश्यकता होने पर चाय, कॉफी, मसालों, रबर आदि के उत्पादन के लिए प्रयोग कराए जा सकते हैं।
केंद्र सरकार एडवाइजरी कमेटी (Advisory Commitees) बना सकती है, जो केंद्र सरकार के वनों के संबंध में नियम बना सकती है।
केंद्र सरकारें वन संबंधी नियम बना सकती है।

वन संरक्षण नियम, 1981 (Forest Conservation Rules, 1980)


उक्त नियम केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए हैं, जो नियम वन संरक्षण अधिनियम, 1980 द्वारा केंद्र सरकार को प्रदत्त अधिकारी के अनुरूप है।

1. एडवाइजरी कमेटी में निम्न सदस्य होंगे-
i. वनों का महानिरीक्षक – अध्यक्ष
ii. अतिरिक्त वन महानिरीक्षक – सदस्य
iii. संयुक्त कमिश्नर मृदा संरक्षण-सदस्य
iv. तीन प्रमुख वैज्ञानिक – सदस्य
v. उप-महानिरीक्षक- वन सचिव सदस्य

2. कमेटी के गैर सरकारी सदस्यों का कार्यकाल 2 वर्ष होगा व उनके यात्रा एवं अन्य भत्ते सरकार द्वारा देय होंगे।
3. कमेटी निम्न प्रकार कार्य करेगी-

i. एक मास में कम-से-कम एक बार बैठक नई दिल्ली में या आवश्यकता होने पर देश में कहीं भी की जा सकती है।
ii. अध्यक्ष के न होने पर वरिष्ठतम व्यक्ति अध्यक्षता कर सकता है।

4. राज्य सरकारों द्वारा विचार के लिए प्रस्ताव भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण सचिव को दिए जाने चाहिए।
5. कमेटी निम्न बिंदुओं पर केंद्र सरकार को सुझाव देगी-
i. किसी वन भूमि, जो प्राकृतिक वन, नेशनल पार्क, वन्य प्राणी पार्क आदि में आती है, के गैर वन संबंधी उपयोग के बारे में।
ii. सुरक्षित वनों का कृषि, शरणार्थी निवास आदि के उपयोग के बारे में।
iii. राज्य सरकारों द्वारा उक्त संबंध में किए गए कार्यों की समीक्षा।
iv. पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव के बारे में।
v. केंद्र सरकार कमेटी के सुझाव मान भी सकती है एवं अन्य विशेष जांच करने के लिए अधिकृत है।

वन्य प्राणी सुरक्षा अधिनियम, 1972 (Wild Life Protection Act, 1972)


उक्त अधिनियम 1972 में पारित किया गया था। इसमें 1982, 1986, 1991 तथा 1993 में संशोधन किए गए।

इस अधिनियम में पशु, पशु पदार्थ (Animal Article), पकड़े हुए पशु (Captive Animal) आदि की समुचित परिभाषाएं दी गई हैं।
इसमें अन्य प्राणी संरक्षण निदेशक, सह-निदेशक, मुख्य वन्य-प्राणी वार्डन, वन्य प्राणी वार्डन तथा अन्य अधीनस्थ कर्मियों के चुनाव और नियुक्ति के निर्देश हैं।
केंद्र अथवा राज्य-स्तर पर वन्य-प्राणी एडवायरी बोर्ड निम्न प्रकार गठित होगा-
i. केंद्र अथवा राज्य सरकार का वन मंत्री-अध्यक्ष
ii. संबंधित विधान सभा के दो सदस्य-सदस्य
iii. राज्य अथवा केंद्र सरकार का वन सचिव-सदस्य
iv. राज्य सरकार का मुख्य वन अधिकारी-पदेन सदस्य
v. निदेशक द्वारा नामित अधिकारी-सदस्य
vi. मुख्य प्राणी वार्डन-पदेन सदस्य
vii. केंद्र अथवा राज्य सरकार द्वारा नामित 10 व्यक्ति, जो वन्य प्राणी संरक्षण अथवा जन-जातियों से संबंधित हों।
4. i. बोर्ड की बैठक वर्ष में कम-से-कम दो बार होगी।
iii. बोर्ड अपनी कार्यशैली तथा कोरम आदि स्वयं तय करेगा।

5. मुख्य वन प्राणी वार्डन द्वारा अनुमत स्थिति के अतिरिक्त किसी स्थिति में वन्य प्राणियों का शिकार करने की अनुमति नहीं है।
6. इस नियम द्वारा विशिष्ट प्रकार के पादपों (Specified Plants) को तोड़ने, झाड़ने, एकत्रित करने की अनुमति बिना केंद्र सरकार के नहीं मिल सकती।
7. बिना लाइसेंस के किन्ही विशिष्ट प्रकार के पादपों को रोपित नहीं कर सकता।
8. इस अधिनियम में एक केंद्रीय जू अधिकरण (Central Zoo Authority) के गठन का प्रावधान किया गया है, जो जू संबंधी कार्यों की देख-रेख करेगा?
9. वन्य प्राणी पदार्थ राष्ट्रीय संपत्ति हैं और उनका व्यापार करना दंडनीय होगा।
10. इस अधिनियम की अनुसूचियों में संरक्षित वन्य प्राणियों, पदार्थों, पादपों आदि की अनुसूची दी गई है।
11. नियमों का उल्लंघन करने पर तीन वर्ष की कैद तथा 25 हजार रुपये जुर्माने या दोनों तक का प्रावधान है।

मोटर गाड़ी अधिनियम, 1988 (Motor Vehicle Act, 1988)


भारतीय मोटर गाड़ी अधिनियम सर्वप्रथम 1914 में बनाया गया था। इसे 1939 में तथा फिर 1988 एवं 1994 में संशोधित किया गया। इस अधिनियम के 1994 तक संशोधित रूप के मुख्य तथ्य निम्न प्रकार हैं-

इस अधिनियम में 14 अध्याय तथा दो अनुसूचियां (SCHEDULES) हैं।
प्रारंभिक अध्याय में परिभाषाएं हैं तथा अन्य अध्यायों में सिलसिलेवार ढंग से ड्राइवर लाइसेंस, बसों के कंडक्टरों का पंजीकरण, मोटर गाड़ियों का पंजीकरण, यातायात नियंत्रण संबंधी नियम एवं शर्तें दी गई हैं।
राज्य स्तर की परिवहन संस्थाओं के नियमन के अधिकार एवं नियम एक अलग अध्याय में दिए गए हैं।
इस अधिनियम में मोटर गाड़ियों के उत्पादन, अनुरक्षण आदि के सामान्य सीमा बंधन भी निर्धारित किए गए हैं।
अन्य व्यक्ति (Third Party) द्वारा दुर्घटना में मोटरगाड़ी की हुई क्षति की पूर्ति के लिए की जाने वाली बीमा योजनाओं के नियम और शर्तें मोटर गाड़ी अधिनियम द्वारा ही नियंत्रित की जाती हैं।
इस अधिनियम में वर्णित नियमों का उल्लंघन होने पर निर्धारित दंड की प्रक्रिया अध्याय 13 में विस्तार से दी गई है।
मोटर गाड़ी अधिनियम के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु के किसी व्यक्ति को चालक लाइसेंस नहीं दिया जा सकता। 20 वर्ष से कम आयु का व्यक्ति किसी यातायात (Transport) गाड़ी का चालक लाइसेंस नहीं ले सकता।
पूर्ण स्थायी लाइसेंस लेने से पूर्व प्रशिक्षु लाइसेंस लेना होता है व पूर्ण स्थायी लाइसेंस 3 वर्ष के लिए मान्य होता है।
गाड़ियों के पंजीकरण के लिए अधिकृत पंजीकरण अधिकारी को आवेदन किया जाना चाहिए।
पंजीकरण 15 वर्षों के लिए मान्य होता है।
यातायात नियंत्रण की दृष्टि से मोटर गाड़ियों के खाली तथा भरे हुए भारों का निर्धारण कर पंजीकरण आदेश में दर्ज किया जाता है। इसका उल्लंघन करने पर दंड का प्रावधान है।
राज्य सरकारें इच्छित स्थानों पर इच्छित मोटर गाड़ियों के प्रवेश एवं चालन पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण प्रदूषण पर स्थायी अथवा अस्थायी रोक लगा सकती है।
दुर्घटना होने पर मोटर चालक को घायल व्यक्ति के उपचार में मदद करनी चाहिए, पुलिस को तुरंत सूचना देनी चाहिए तथा बीमा कंपनी को सूचना देनी चाहिए।
अधिकृत व्यक्तियों को अधिनियम में वर्णित सूचनाएं न देने पर 500 रुपए आर्थिक दंड का प्रावधान है।
अनधिकृत व्यक्ति द्वारा मोटर गाड़ी चालन करने पर तीन मास की कैद या 1000 रुपए आर्थिक दंड का प्रावधान है।
निर्धारित गति से अधिक गति पर मोटर चालन करने पर 1000 रुपए तक आर्थिक दंड खतरनाक विधि से मोटर चालन पर प्रथम बार में 6 मास का कारावास या और 1000 रुपए जुर्माना, अगले अपराध पर 2 वर्ष तक की कैद या 2000 रुपए जुर्माने का प्रावधान है। शराब पीकर गाड़ी चलाने पर पहली बार पकड़े जाने पर 6 माह की कैद व दूसरी बार में 3 वर्ष तक कैद हो सकती है।
शोर अथवा अन्य किसी प्रकार का प्रदूषण करने वाले वाहन को चलाने पर पहली बार 500 रुपए तक व अगली बार 2000 रुपए तक जुर्माना किया जा सकता है।
पर्यावरण समस्याओं के प्रति जागरुकता उत्पन्न करने तथा पर्यावरण संरक्षण में जन भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा पर्यावरण अध्ययन को अनिवार्य विषय के रूप में विश्वविद्यालयों-विद्यालयों में सम्मिलित किया गया है।

भारत मे पर्यावरण की समस्या

भारत मे पर्यावरण की समस्या


भारत में पर्यावरण की कई समस्या है। वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, कचरा, और प्राकृतिक पर्यावरण के प्रदूषण भारत के लिए चुनौतियों हैं। पर्यावरण की समस्या की परिस्थिति 1947 से 1995 तक बहुत ही खराब थी। 1995 से २०१० के बीच विश्व बैंक के विशेषज्ञों के अध्ययन के अनुसार, अपने पर्यावरण के मुद्दों को संबोधित करने और अपने पर्यावरण की गुणवत्ता में सुधार लाने में के अनुसार भारत दुनिया में सबसे तेजी से प्रगति कर रहा है। फिर भी, भारत विकसित अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों के स्तर तक आने में इसी तरह के पर्यावरण की गुणवत्ता तक पहुँचने के लिए एक लंबा रास्ता तय करना है।भारत के लिए एक बड़ी चुनौती और अवसर है। पर्यावरण की समस्या का, बीमारी, स्वास्थ्य के मुद्दों और भारत के लिए लंबे समय तक आजीविका पर प्रभाव का मुख्य कारण हैं।

कारणसंपादित करें

कुछ पर्यावरण के मुद्दों के बारे में कारण के रूप में आर्थिक विकास को उद्धृत किया है।दूसरे, आर्थिक विकास में भारत के पर्यावरण प्रबंधन में सुधार लाने और देश के प्रदूषण को रोकने के लिए महत्वपूर्ण है विश्वास करते हैं।बढ़ती जनसंख्या भारत के पर्यावरण क्षरण का प्राथमिक कारण भी है ऐसा सुझाव दिया गया है।व्यवस्थित अध्ययन में इस सिद्धांत को चुनौती दी गई है

प्रमुख समस्यासंपादित करें

जंगल और जमीन की कृषि गिरावट, संसाधनों की कमी (पानी, खनिज, वन, रेत, पत्थर आदि),पर्यावरण क्षरण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, जैव विविधता के नुकसान, पारिस्थितिकी प्रणालियों में लचीलेपन की कमी है, गरीबों के लिए आजीविका सुरक्षा है। भारत में प्रदूषण का प्रमुख स्रोत ऐसी ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत के रूप में पशुओं से सूखे कचरे के रूप में फ्युलवुड और बायोमास का बड़े पैमाने पर जलना, संगठित कचरा और कचरे को हटाने सेवाओं की एसीके, मलजल उपचार के संचालन की कमी, बाढ़ नियंत्रण और मानसून पानी की निकासी प्रणाली, नदियों में उपभोक्ता कचरे के मोड़, प्रमुख नदियों के पास दाह संस्कार प्रथाओं की कमी है, सरकार अत्यधिक पुराना सार्वजनिक परिवहन प्रदूषण की सुरक्षा अनिवार्य है, और जारी रखा 1950-1980 के बीच बनाया सरकार के स्वामित्व वाले, उच्च उत्सर्जन पौधों की भारत सरकार द्वारा आपरेशन है।
वायु प्रदूषण, गरीब कचरे का प्रबंधन, बढ़ रही पानी की कमी, गिरते भूजल टेबल, जल प्रदूषण, संरक्षण और वनों की गुणवत्ता, जैव विविधता के नुकसान, और भूमि / मिट्टी का क्षरण प्रमुख पर्यावरणीय मुद्दों में से कुछ भारत की प्रमुख समस्या है। भारत की जनसंख्या वृद्धि पर्यावरण के मुद्दों और अपने संसाधनों के लिए दबाव समस्या बढ़ाते है।

जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरण की गुणवत्तासंपादित करें

जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरण के बीच बातचीत के बारे में अध्ययन और बहस का एक लंबा इतिहास है। एक ब्रिटिश विचारक माल्थस के अनुसार, उदाहरण के लिए, एक बढ़ती हुई जनसंख्या पर्यावरण क्षरण के कारण, और गरीब गुणवत्ता के रूप में के रूप में अच्छी तरह से गरीब की भूमि की खेती के लिए मजबूर कर रहा, कृषि भूमि पर दबाव डाल रही है।यह पर्यावरण क्षरण अंततः, कृषि पैदावार और खाद्य पदार्थों की उपलब्धता को कम कर देता है, जिससे जनसंख्या वृद्धि की दर को कम करने, अकाल और रोगों और मृत्यु का कारण बनता है । यह पर्यावरण की क्षमता पर दबाव डाल सकता है जनसंख्या वृद्धि ने भी हवा, पानी, और ठोस अपशिष्ट प्रदूषण का एक प्रमुख कारण के रूप में देखा जाता है।

पर्यावरण के समस्या और भारतीय कानूनसंपादित करें

1980 के दशक के बाद से, भारत के सर्वोच्च न्यायालय समर्थक सक्रिय रूप से भारत के पर्यावरण के मुद्दों में लगा हुआ है।भारत के उच्चतम न्यायालय की व्याख्या और सीधे पर्यावरण न्यायशास्त्र में नए परिवर्तन शुरू करने में लगा हुआ है। न्यायालय के निर्देशों और निर्णय की एक श्रृंखला के माध्यम से मौजूदा वालों पर अतिरिक्त शक्तियां, पर्यावरण कानूनों को फिर से व्याख्या की है, पर्यावरण की रक्षा के लिए नए संस्थानों और संरचनाओं नए सिद्धांतों बनाया नीचे रखी है, और नवाजा गया है। पर्यावरण के मुद्दों पर जनहित याचिका और न्यायिक सक्रियता भारत के सुप्रीम कोर्ट से परे फैली हुई है। यह अलग-अलग राज्यों के उच्च न्यायालयों में शामिल हैं। 

वन और संरक्षणसंपादित करें

खराब वायु गुणवत्ता, जल प्रदूषण और कचरे के प्रदूषण - सभी पारिस्थितिक तंत्र के लिए आवश्यक खाद्य और पर्यावरण की गुणवत्ता प्रभावित करते हैं। भारतीय जंगलों वन वनस्पति की विविधता और वितरण बड़ी है।

विरोधाभाससंपादित करें

भारत में 2015 में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ग्रीनपीस रोकने की कोशिश की। 

विकास प्रक्रिया तथा विकास उद्योग- गैर-सरकारी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों, विभिन्न समूहों और संघों, Public Administration 16 paper

शासन व्यवस्था , साविधान , शासन प्रणाली, सामाजिक न्याय तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंध 
: विकास प्रक्रिया तथा विकास उद्योग- गैर-सरकारी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों, विभिन्न समूहों और संघों, दानकर्त्ताओं, लोकोपकारी संस्थानों, संस्थागत एवं अन्य पक्षों की भूमिकाl)

संदर्भ

जेनेवा कन्वेंशन कहता है कि सरकार, समाज के संपूर्ण विकास के समस्त कार्यों को नहीं देख सकती है इसलिये कहीं न कहीं समाज को भी उसमें हिस्सेदार बनना चाहियेl इसके बाद से एनजीओ सामने आएlएनजीओ को समाज और सरकार के बीच की खाई को भरने की मंशा से लाया गया थाl उसे  व्यक्ति और सरकार के बीच की कड़ी को जोड़ने के लिये सामने लाया गयाl यद्यपि एनजीओ को एक परोपकारी संस्था के रूप में माना गया था क्योंकि एनजीओ का शाब्दिक अर्थ होता है गैर-सरकारी संगठनl सर्वप्रथम यह अमेरिका में अस्तित्व में आया जहाँ इसे नॉन प्रॉफिट ओर्गेनाइज़ेशन(NPO) ही कहा जाता थाlभारत में इस समय लगभग 33 लाख एनजीओ हैंl इसका अर्थ हुआ कि औसतन लगभग 400 भारतीयों के पीछे एक स्वैच्छिक संगठन हैl सिर्फ दिल्ली के अंदर ही 76 हज़ार एनजीओ हैं लेकिन इनमें से कोई भी अपना लेखा-जोखा सरकार को नहीं देता हैl केरल में तो एनजीओ द्वारा सरकार को लेखा-जोखा न देने का बाकायदा प्रावधान भी हैlभारत में जितने प्राथमिक स्कूल नहीं हैं उससे कहीं ज़्यादा एनजीओ हैंl रूस के बाद भारत ही विश्व का ऐसा देश है जहाँ गैर-सरकारी और लाभ के बिना काम करने वाले सक्रिय संगठनों की संख्या सर्वाधिक हैl अतः प्रश्न उठता है कि इतने सारे संगठनों के बावजूद जनहित का मुद्दा मुरझाया क्यों है?सीबीआई की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई रिपोर्ट के मुताबिक देश भर में करीब 32  लाख 97 हज़ार एनजीओ हैं जिनमें से सिर्फ 3 लाख 700  ने ही अपने खर्च का लेखा जोखा सरकार को दिया है, बाकी के एनजीओ ने कोई बैलेंस शीट दाखिल नहीं की हैlसुप्रीम कोर्ट ने इस पर सख्त नाराज़गी जताते हुए सरकार को कानून बनाने का सुझाव दिया है क्योंकि सरकारी पैसे का दुरुपयोग करने वाले NGO के लिये सरकारी गाइडलाइन प्रभावी नहीं हैंl कोर्ट ने केंद्र को NGO और स्वैच्छिक संस्थाओं को दिए जाने वाले सरकारी फंड के नियंत्रण को लेकर ऐसा कहा हैlअतः प्रश्न उठता है कि भारत में एनजीओ क्रियान्वयन को लेकर क्या-क्या समस्याएँ हैं और उनके सही विनियमन का क्या प्रावधान हो सकते हैं? इसी मुद्दे पर केंद्रित है यह परिचर्चाl एनजीओ- सामान्य परिचय द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब 1945 में यूएनओ की स्थापना हुई थी तो उसके चार्टर के अध्याय 10 के अनुच्छेद 71 में उन संगठनों की चर्चा की गई थी जो समाज के हितार्थ बिना लाभ की मंशा से सरकार के लोक कल्याणकारी काम करते हैंlएक वेलफेयर डेमोक्रेटिक स्टेट में जनहित के कार्यों में ऐसे संगठनों की भागीदारी होती है अतः इन्हें कर लाभ में सरकार की तरफ से छूट मिलती हैlभारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1) जनता को किसी संगठन के निर्माण का अवसर प्रदान करता है और जो संगठन जनहित के कार्य में संलग्न होता है उन्हें टैक्स में छूट भी दी जाती है  किंतु उन्हें इंडियन सोसाइटी एक्ट-1860 के अंतर्गत रजिस्टर्ड होना चाहिएlएनजीओ की फोरेन डोनेशन भारत सरकार के विदेशी चंदा विनियामक अधिनियम, 1976 के तहत देखी जाती हैlइसके अतिरिक्त, राज्यों के भी अपने कानून हैं जिनके तहत एनजीओ पंजीकृत होते हैं, जैसे मुंबई सार्वजनिक ट्रस्ट, राजस्थान सोसाइटी एक्ट आदिl साथ ही, कुछ ट्रस्ट और सोसाइटीज़ भारतीय कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा-25 के तहत भी पंजीकृत होती हैंl


 समस्याएं क्या हैं?

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि औसतन हर साल 950 करोड रुपए एनजीओ को दिये गएl यह बहुत बड़ी रकम हैl इतनी बड़ी रकम एनजीओ को जन हितार्थ दी जाती हैं लेकिन उसका क्या आउटपुट है, वह पैसा कहाँ खर्च होता है इसको देखने वाली कोई सशक्त एजेंसी नहीं है, यह एक बहुत बड़ी समस्या हैl 33 लाख में मात्र 3 लाख एनजीओ ही अपना रिटर्न भरते हैं यानी अधिकांश एनजीओ अपने आय-व्यय का ब्यौरा नहीं देते इसलिये उनके धन का सदुपयोग हुआ है कि नहीं यह पता ही नहीं चलता हैl यानी एनजीओ को दिये सरकारी धन का ऑडिट न होना एक बड़ी समस्या हैlसरकारी आँकड़ों के अनुसार 1970 तक देश में केवल 1.44 लाख समितियाँ पंजीकृत थीं, लेकिन जब भारत ने नई आर्थिक नीतियों को 90 के दशक में लागू किया उसके बाद एनजीओ की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई अतः यह चिंता अक्सर उभरती है कि इतने संगठन जनहित के कार्यों के लिये बने हैं या फिर नवउदारवादी हितों के संरक्षण के लियेlएक सैद्धांतिक समस्या यह दिखाई देती है कि भारत में जो भी एनजीओ बने हैं वे केवल इंडियन सोसाइटी एक्ट के अंतर्गत ही पंजीकृत नहीं हैं बल्कि राज्यों के कानून तथा भारतीय कंपनी अधिनियम की धाराओं के तहत भी पंजीकृत होते हैंl कहने का तात्पर्य यह है कि एनजीओ के पंजीकरण के नियमों में विभिन्नता है जो कि गलत प्रतीत होता हैlएक समस्या यह भी दिखाई देती है कि अंग्रेजों के ज़माने से चले आ रहे इंडियन सोसाइटी एक्ट,1860 जैसे कानूनों की जटिलता को कम करना और उन्हें तर्कसंगत बनाना ज़रूरी हैlएनजीओ के विदेशी चंदे लेने संबंधी नियमों को भी प्रासंगिक बनाते हुए उन्हें सख्ती से लागू किये जाने की ज़रूरत को महसूस किया जाता रहा है क्योंकि खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक बहुत सारी विदेशी कंपनियाँ भारत में अपने हित साधने के लिये एनजीओ खोलकर अपने अनुकूल माहौल बनवाती हैंl साथ ही काले धन को भी सफेद करवाती हैंlकई देश भी भारत के आर्थिक विकास को अवरुद्ध करने हेतु भारत में एनजीओ खुलवाते हैं और उन्हें फंडिंग करते हैं जिसका कोई लेखा-जोखा नहीं होता और ये एनजीओ जल-जंगल-ज़मीन के नाम पर आदिवासियों को भड़काते भी हैं और माओवादी हिंसा भी करवाते हैंl

समाधान

सर्वप्रथम तो एनजीओ की बढ़ती संख्या को नियंत्रित करने हेतु इनके पंजीकरण के नियमों को सख्त किये जाने की ज़रूरत हैlजो एनजीओ बैलेंस शीट देकर अपना लेखा-जोखा न दें उनके खिलाफ वसूली के लिये सिविल और दीवानी कार्रवाई होlएनजीओ को नियमित करने, उनकी मान्यता व उन्हें फंड जारी करने से लेकर हिसाब- किताब लेने तक के दिशानिर्देश तय होंlएनजीओ को ऑडिट एकाउंट,  इनकम टैक्स रिटर्न के अलावा काम करने के क्षेत्र और मुख्य कार्यकर्त्ताओं की जानकारी देना बाध्य किया जाएlएनजीओ को उसके अंदरूनी कामकाज और नैतिक स्टैंडर्ड के मूल्यांकन के बाद ही मान्यता दी जाएlमान्यता देने के बाद एनजीओ को मिलने वाले फंड के इस्तेमाल के मूल्यांकन के लिये त्रिस्तरीय ( थ्री टियर) छानबीन होlफंड का दुरुपयोग करने वाले एनजीओ और स्वैच्छिक संस्थाओं के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जाएlहस्ताक्षरकर्त्ता सामूहिक रूप से फंड वापस करने के लिये जवाबदेह होlअगर सरकार किसी एनजीओ के प्रोजेक्ट से संतुष्ट नहीं होती या उसे लगता है कि गाइडलाइन का उल्लंघन हो रहा है तो तत्काल प्रभाव से फंड देने पर रोक लगाने का सरकार को अधिकार होना चाहियेlविदेशी चंदा विनियामक अधिनियम, 1976 राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा कानून है इसलिये इसे अत्यधिक सख्त बनाते हुए विदेशी चंदे पर निगरानी कड़ी करने की ज़रूरत हैlग्रामीण विकास मंत्रालय और कपार्ट को और अधिक चुस्त किये जाने की ज़रूरत है, क्योंकि कपार्ट को ही एनजीओ को सरकारी रकम देने तथा उसे ब्लैक लिस्ट करने का अधिकार हैlजो एनजीओ झूठी सूचनाओं के आधार पर सरकार से फंड ले, उसे ब्लैक लिस्ट किया जाना चाहियेlदेश के सभी एनजीओ को फिर से नीति आयोग में ऑनलाइन पंजीकरण कराना होगा और एनजीओ को एक यूनिक आईडी देने पर भी विचार किया जा सकता हैlकुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार सरकार को एनजीओ से संबंधित एक नया कानून लाने की ज़रूरत है जिसे सरकार ने भी स्वीकारा है और इस संदर्भ में काम हो रहा हैl कपार्ट (Council for Advancement of People`s Action and Rural Technology) जन सहयोग एवं ग्रामीण प्रौद्योगिकी विकास परिषद अर्थात् कपार्ट का गठन एक सितम्बर,1986 को किया गया थाl इसका मुख्यालय नई दिल्ली में हैl
इसका मुख्य कार्य ग्रामीण संवृद्धि के लिये परियोजनाओं के कार्यान्वयन में स्वैच्छिक कार्य को प्रोत्साहन देना और उसमें मदद करना हैl
कपार्ट ने 9 प्रादेशिक समितियाँ स्थापित की थीं जिन्हें अपने-अपने प्रदेशों में एनजीओ को 25 लाख रूपए तक के परिव्यय वाली परियोजनाओं को मंज़ूरी देने की शक्तियाँ प्राप्त थींl
कपार्ट की इन प्रादेशिक समितियों को मार्च 2012 में बंद कर दिया गया थाl
अब कपार्ट को फिर से ग्रामीण विकास मंत्रालय के अधीन पुनार्गठित कर कार्यरत किया गया हैl
कपार्ट की स्‍थापना दो ए‍‍जेंसियों को मिलाकर हुई है- 'काउंसिल फॉर एडवांसमेंट ऑफ रूरल टेक्‍नोलॉजी' (सी.ए.आर.टी) तथा पीपुल्‍स एक्‍शन फॉर डेवलपमेंट इंडिया (पी.ए.डी.आई)l
कहने का तात्पर्य यह कि कपार्ट देश के सभी 33 लाख एनजीओ को धन उपलब्ध कराने का ज़िम्मा नहीं रखती है बल्कि सिर्फ ग्रामीण विकास और कृषि से जुड़े गैर-सरकारी संगठनों को धन मुहैया करवाने वाली संस्था हैl

 निष्कर्ष
गैर-सरकारी संगठनों के प्रति भारतीय समाज की मुख्य शिकायतें विदेशी चंदा नियमन अधिनियम, 1976 एवं पंजीकरण के नियम के प्रावधानों का उल्लंघन, अपनी गतिविधियों तथा आय-व्यय का ब्यौरा न प्रस्तुत करना तथा सरकारी धन की हेराफेरी करना आदि हैl एनजीओ के इस तरह के कार्यों के परिणामस्वरूप देश को महत्त्वपूर्ण आर्थिक क्षति का सामना करना पड़ा है तथा एनजीओ के विकास  अभियानों से राष्ट्रीय सुरक्षा भी खतरे में पड़ी हैl सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी टिप्पणी में विगत अप्रैल में कहा था कि एनजीओ को दिया गया फंड जनता का पैसा हैl जनता के पैसे का हिसाब रखा जाना चाहियेl जो इसका दुरुपयोग करें उस पर कार्रवाई होनी ज़रूरी हैl इसलिये एनजीओ के नियमन हेतु नए सिरे से एक सख्त कानून की आवश्यकता है जिसे माननीय सर्वोच्च न्यायालय के साथ-साथ आम जन ने भी महसूस किया हैl अतः सरकार को इस दिशा में अविलम्ब महत्त्वपूर्ण कदम उठाने की ज़रूरत हैl

आपदा प्रबन्धन , PA 4tg sem Question1

आपदा प्रबन्धन
सूखा, बाढ़, चक्रवाती तूफानों, भूकम्प, भूस्खलन, वनों में लगनेवाली आग, ओलावृष्टि, टिड्डी दल और ज्वालामुखी फटने जैसी विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है, न ही इन्हें रोका जा सकता है लेकिन इनके प्रभाव को एक सीमा तक जरूर कम किया जा सकता है, जिससे कि जान-माल का कम से कम नुकसान हो। यह कार्य तभी किया जा सकता है, जब सक्षम रूप से आपदा प्रबंधन का सहयोग मिले। प्रत्येक वर्ष प्राकृतिक आपदाओं से सर्वाधिक प्रभावित होने वाले देशों में भारत का दसवां स्थान है।
परिचय
आपदा प्रबंधन के दो महत्वपूर्ण आंतरिक पहलू हैं। वह हैं पूर्ववर्ती और उत्तरवर्ती आपदा प्रबंधन। पूर्ववर्ती आपदा प्रबंधन को जोखिम प्रबंधन के रूप में जाना जाता है।
आपदा के खतरे जोखिम एवं शीघ्र चपेट में आनेवाली स्थितियों के मेल से उत्पन्न होते हैं। यह कारक समय और भौगोलिक – दोनों पहलुओं से बदलते रहते हैं। जोखिम प्रबंधन के तीन घटक होते हैं। इसमें खतरे की पहचान, खतरा कम करना (ह्रास) और उत्तरवर्ती आपदा प्रबंधन शामिल है।
आपदा प्रबंधन का पहला चरण है खतरों की पहचान। इस अवस्था पर प्रकृति की जानकारी तथा किसी विशिष्ट अवस्थल की विशेषताओं से संबंधित खतरे की सीमा को जानना शामिल है। साथ ही इसमें जोखिम के आंकलन से प्राप्त विशिष्ट भौतिक खतरों की प्रकृति की सूचना भी समाविष्ट है।
इसके अतिरिक्त बढ़ती आबादी के प्रभाव क्षेत्र एवं ऐसे खतरों से जुड़े माहौल से संबंधित सूचना और डाटा भी आपदा प्रबंधन का अंग है। इसमें ऐसे निर्णय लिए जा सकते हैं कि निरंतर चलनेवाली परियोजनाएं कैसे तैयार की जानी हैं और कहां पर धन का निवेश किया जाना उचित होगा, जिससे दुर्दम्य आपदाओं का सामना किया जा सके।
इस प्रकार जोखिम प्रबंधन तथा आपदा के लिए नियुक्त व्यावसायिक मिलकर जोखिम भरे क्षेत्रों के अनुमान से संबंधित कार्य करते हैं। ये व्यवसायी आपदा के पूर्वानुमान के आंकलन का प्रयास करते हैं और आवश्यक एहतियात बरतते हैं।
जनशक्ति, वित्त और अन्य आधारभूत समर्थन आपदा प्रबंधन की उप-शाखा का ही हिस्सा हैं। आपदा के बाद की स्थिति आपदा प्रबंधन का महत्वपूर्ण आधार है। जब आपदा के कारण सब कुछ अस्त-व्यस्त हो जाता है तब लोगों को स्वयं ही उजड़े जीवन को पुन: बसाना होता है तथा अपने दिन-प्रतिदिन के कार्य पुन: शुरू करने पड़ते हैं।
आपदा प्रबंधक के कार्य
आपदा प्रबंधकों को ऐसे प्रभावित क्षेत्रों में सामान्य जीवन बहाल करने का कार्य करना पड़ता है। आपदा प्रबंधन व्यावसायिक समन्वयक के रूप में कार्य करता है। यह सुनिश्चित करता है कि समस्त आवश्यक सहायक साधन और सुविधाएं सही समय पर आपदाग्रस्त क्षेत्र में उपलब्ध हैं, जिससे कम से कम नुकसान होता है।
यह प्रबंधक ऐसे विशेषज्ञ लोगों के समूह का मुखिया होता है, जिनकी सेवाएं आपदा के समय अनिवार्य होती हैं। जैसे-डॉक्टर, नर्स, सिविल इंजीनियर, दूरसंचार विशेषज्ञ, वास्तुशिल्प, इलेक्ट्रीशियन इत्यादि।
आपदा प्रबंधन की सबसे बड़ी चुनौती आपदाग्रस्त सीमा-क्षेत्र और होनेवाली क्षति का आंकलन करना है। इससे इस क्षेत्र का कार्य अत्यधिक वैज्ञानिक प्रक्रिया का रूप ले लेता है। आपदाग्रस्त क्षेत्रों की भौगोलिक एवं आर्थिक स्थितियों के कारण चुनौती और भी बढ़ जाती है।
आपदा अधिकार-क्षेत्र की तमाम सीमाएं लांघ सकती है। विपत्ति के समय अनजान कार्यों की जिम्मेदारी उठाने की आवश्यकता भी उत्पन्न होती है। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए विशेष कर्मियों की जरूरत होती है। इससे यह कार्य और अधिक कठिन हो जाता है।

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