भारत मे पर्यावरण की समस्या

भारत मे पर्यावरण की समस्या


भारत में पर्यावरण की कई समस्या है। वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, कचरा, और प्राकृतिक पर्यावरण के प्रदूषण भारत के लिए चुनौतियों हैं। पर्यावरण की समस्या की परिस्थिति 1947 से 1995 तक बहुत ही खराब थी। 1995 से २०१० के बीच विश्व बैंक के विशेषज्ञों के अध्ययन के अनुसार, अपने पर्यावरण के मुद्दों को संबोधित करने और अपने पर्यावरण की गुणवत्ता में सुधार लाने में के अनुसार भारत दुनिया में सबसे तेजी से प्रगति कर रहा है। फिर भी, भारत विकसित अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों के स्तर तक आने में इसी तरह के पर्यावरण की गुणवत्ता तक पहुँचने के लिए एक लंबा रास्ता तय करना है।भारत के लिए एक बड़ी चुनौती और अवसर है। पर्यावरण की समस्या का, बीमारी, स्वास्थ्य के मुद्दों और भारत के लिए लंबे समय तक आजीविका पर प्रभाव का मुख्य कारण हैं।

कारणसंपादित करें

कुछ पर्यावरण के मुद्दों के बारे में कारण के रूप में आर्थिक विकास को उद्धृत किया है।दूसरे, आर्थिक विकास में भारत के पर्यावरण प्रबंधन में सुधार लाने और देश के प्रदूषण को रोकने के लिए महत्वपूर्ण है विश्वास करते हैं।बढ़ती जनसंख्या भारत के पर्यावरण क्षरण का प्राथमिक कारण भी है ऐसा सुझाव दिया गया है।व्यवस्थित अध्ययन में इस सिद्धांत को चुनौती दी गई है

प्रमुख समस्यासंपादित करें

जंगल और जमीन की कृषि गिरावट, संसाधनों की कमी (पानी, खनिज, वन, रेत, पत्थर आदि),पर्यावरण क्षरण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, जैव विविधता के नुकसान, पारिस्थितिकी प्रणालियों में लचीलेपन की कमी है, गरीबों के लिए आजीविका सुरक्षा है। भारत में प्रदूषण का प्रमुख स्रोत ऐसी ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत के रूप में पशुओं से सूखे कचरे के रूप में फ्युलवुड और बायोमास का बड़े पैमाने पर जलना, संगठित कचरा और कचरे को हटाने सेवाओं की एसीके, मलजल उपचार के संचालन की कमी, बाढ़ नियंत्रण और मानसून पानी की निकासी प्रणाली, नदियों में उपभोक्ता कचरे के मोड़, प्रमुख नदियों के पास दाह संस्कार प्रथाओं की कमी है, सरकार अत्यधिक पुराना सार्वजनिक परिवहन प्रदूषण की सुरक्षा अनिवार्य है, और जारी रखा 1950-1980 के बीच बनाया सरकार के स्वामित्व वाले, उच्च उत्सर्जन पौधों की भारत सरकार द्वारा आपरेशन है।
वायु प्रदूषण, गरीब कचरे का प्रबंधन, बढ़ रही पानी की कमी, गिरते भूजल टेबल, जल प्रदूषण, संरक्षण और वनों की गुणवत्ता, जैव विविधता के नुकसान, और भूमि / मिट्टी का क्षरण प्रमुख पर्यावरणीय मुद्दों में से कुछ भारत की प्रमुख समस्या है। भारत की जनसंख्या वृद्धि पर्यावरण के मुद्दों और अपने संसाधनों के लिए दबाव समस्या बढ़ाते है।

जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरण की गुणवत्तासंपादित करें

जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरण के बीच बातचीत के बारे में अध्ययन और बहस का एक लंबा इतिहास है। एक ब्रिटिश विचारक माल्थस के अनुसार, उदाहरण के लिए, एक बढ़ती हुई जनसंख्या पर्यावरण क्षरण के कारण, और गरीब गुणवत्ता के रूप में के रूप में अच्छी तरह से गरीब की भूमि की खेती के लिए मजबूर कर रहा, कृषि भूमि पर दबाव डाल रही है।यह पर्यावरण क्षरण अंततः, कृषि पैदावार और खाद्य पदार्थों की उपलब्धता को कम कर देता है, जिससे जनसंख्या वृद्धि की दर को कम करने, अकाल और रोगों और मृत्यु का कारण बनता है । यह पर्यावरण की क्षमता पर दबाव डाल सकता है जनसंख्या वृद्धि ने भी हवा, पानी, और ठोस अपशिष्ट प्रदूषण का एक प्रमुख कारण के रूप में देखा जाता है।

पर्यावरण के समस्या और भारतीय कानूनसंपादित करें

1980 के दशक के बाद से, भारत के सर्वोच्च न्यायालय समर्थक सक्रिय रूप से भारत के पर्यावरण के मुद्दों में लगा हुआ है।भारत के उच्चतम न्यायालय की व्याख्या और सीधे पर्यावरण न्यायशास्त्र में नए परिवर्तन शुरू करने में लगा हुआ है। न्यायालय के निर्देशों और निर्णय की एक श्रृंखला के माध्यम से मौजूदा वालों पर अतिरिक्त शक्तियां, पर्यावरण कानूनों को फिर से व्याख्या की है, पर्यावरण की रक्षा के लिए नए संस्थानों और संरचनाओं नए सिद्धांतों बनाया नीचे रखी है, और नवाजा गया है। पर्यावरण के मुद्दों पर जनहित याचिका और न्यायिक सक्रियता भारत के सुप्रीम कोर्ट से परे फैली हुई है। यह अलग-अलग राज्यों के उच्च न्यायालयों में शामिल हैं। 

वन और संरक्षणसंपादित करें

खराब वायु गुणवत्ता, जल प्रदूषण और कचरे के प्रदूषण - सभी पारिस्थितिक तंत्र के लिए आवश्यक खाद्य और पर्यावरण की गुणवत्ता प्रभावित करते हैं। भारतीय जंगलों वन वनस्पति की विविधता और वितरण बड़ी है।

विरोधाभाससंपादित करें

भारत में 2015 में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ग्रीनपीस रोकने की कोशिश की। 

विकास प्रक्रिया तथा विकास उद्योग- गैर-सरकारी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों, विभिन्न समूहों और संघों, Public Administration 16 paper

शासन व्यवस्था , साविधान , शासन प्रणाली, सामाजिक न्याय तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंध 
: विकास प्रक्रिया तथा विकास उद्योग- गैर-सरकारी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों, विभिन्न समूहों और संघों, दानकर्त्ताओं, लोकोपकारी संस्थानों, संस्थागत एवं अन्य पक्षों की भूमिकाl)

संदर्भ

जेनेवा कन्वेंशन कहता है कि सरकार, समाज के संपूर्ण विकास के समस्त कार्यों को नहीं देख सकती है इसलिये कहीं न कहीं समाज को भी उसमें हिस्सेदार बनना चाहियेl इसके बाद से एनजीओ सामने आएlएनजीओ को समाज और सरकार के बीच की खाई को भरने की मंशा से लाया गया थाl उसे  व्यक्ति और सरकार के बीच की कड़ी को जोड़ने के लिये सामने लाया गयाl यद्यपि एनजीओ को एक परोपकारी संस्था के रूप में माना गया था क्योंकि एनजीओ का शाब्दिक अर्थ होता है गैर-सरकारी संगठनl सर्वप्रथम यह अमेरिका में अस्तित्व में आया जहाँ इसे नॉन प्रॉफिट ओर्गेनाइज़ेशन(NPO) ही कहा जाता थाlभारत में इस समय लगभग 33 लाख एनजीओ हैंl इसका अर्थ हुआ कि औसतन लगभग 400 भारतीयों के पीछे एक स्वैच्छिक संगठन हैl सिर्फ दिल्ली के अंदर ही 76 हज़ार एनजीओ हैं लेकिन इनमें से कोई भी अपना लेखा-जोखा सरकार को नहीं देता हैl केरल में तो एनजीओ द्वारा सरकार को लेखा-जोखा न देने का बाकायदा प्रावधान भी हैlभारत में जितने प्राथमिक स्कूल नहीं हैं उससे कहीं ज़्यादा एनजीओ हैंl रूस के बाद भारत ही विश्व का ऐसा देश है जहाँ गैर-सरकारी और लाभ के बिना काम करने वाले सक्रिय संगठनों की संख्या सर्वाधिक हैl अतः प्रश्न उठता है कि इतने सारे संगठनों के बावजूद जनहित का मुद्दा मुरझाया क्यों है?सीबीआई की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई रिपोर्ट के मुताबिक देश भर में करीब 32  लाख 97 हज़ार एनजीओ हैं जिनमें से सिर्फ 3 लाख 700  ने ही अपने खर्च का लेखा जोखा सरकार को दिया है, बाकी के एनजीओ ने कोई बैलेंस शीट दाखिल नहीं की हैlसुप्रीम कोर्ट ने इस पर सख्त नाराज़गी जताते हुए सरकार को कानून बनाने का सुझाव दिया है क्योंकि सरकारी पैसे का दुरुपयोग करने वाले NGO के लिये सरकारी गाइडलाइन प्रभावी नहीं हैंl कोर्ट ने केंद्र को NGO और स्वैच्छिक संस्थाओं को दिए जाने वाले सरकारी फंड के नियंत्रण को लेकर ऐसा कहा हैlअतः प्रश्न उठता है कि भारत में एनजीओ क्रियान्वयन को लेकर क्या-क्या समस्याएँ हैं और उनके सही विनियमन का क्या प्रावधान हो सकते हैं? इसी मुद्दे पर केंद्रित है यह परिचर्चाl एनजीओ- सामान्य परिचय द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब 1945 में यूएनओ की स्थापना हुई थी तो उसके चार्टर के अध्याय 10 के अनुच्छेद 71 में उन संगठनों की चर्चा की गई थी जो समाज के हितार्थ बिना लाभ की मंशा से सरकार के लोक कल्याणकारी काम करते हैंlएक वेलफेयर डेमोक्रेटिक स्टेट में जनहित के कार्यों में ऐसे संगठनों की भागीदारी होती है अतः इन्हें कर लाभ में सरकार की तरफ से छूट मिलती हैlभारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1) जनता को किसी संगठन के निर्माण का अवसर प्रदान करता है और जो संगठन जनहित के कार्य में संलग्न होता है उन्हें टैक्स में छूट भी दी जाती है  किंतु उन्हें इंडियन सोसाइटी एक्ट-1860 के अंतर्गत रजिस्टर्ड होना चाहिएlएनजीओ की फोरेन डोनेशन भारत सरकार के विदेशी चंदा विनियामक अधिनियम, 1976 के तहत देखी जाती हैlइसके अतिरिक्त, राज्यों के भी अपने कानून हैं जिनके तहत एनजीओ पंजीकृत होते हैं, जैसे मुंबई सार्वजनिक ट्रस्ट, राजस्थान सोसाइटी एक्ट आदिl साथ ही, कुछ ट्रस्ट और सोसाइटीज़ भारतीय कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा-25 के तहत भी पंजीकृत होती हैंl


 समस्याएं क्या हैं?

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि औसतन हर साल 950 करोड रुपए एनजीओ को दिये गएl यह बहुत बड़ी रकम हैl इतनी बड़ी रकम एनजीओ को जन हितार्थ दी जाती हैं लेकिन उसका क्या आउटपुट है, वह पैसा कहाँ खर्च होता है इसको देखने वाली कोई सशक्त एजेंसी नहीं है, यह एक बहुत बड़ी समस्या हैl 33 लाख में मात्र 3 लाख एनजीओ ही अपना रिटर्न भरते हैं यानी अधिकांश एनजीओ अपने आय-व्यय का ब्यौरा नहीं देते इसलिये उनके धन का सदुपयोग हुआ है कि नहीं यह पता ही नहीं चलता हैl यानी एनजीओ को दिये सरकारी धन का ऑडिट न होना एक बड़ी समस्या हैlसरकारी आँकड़ों के अनुसार 1970 तक देश में केवल 1.44 लाख समितियाँ पंजीकृत थीं, लेकिन जब भारत ने नई आर्थिक नीतियों को 90 के दशक में लागू किया उसके बाद एनजीओ की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई अतः यह चिंता अक्सर उभरती है कि इतने संगठन जनहित के कार्यों के लिये बने हैं या फिर नवउदारवादी हितों के संरक्षण के लियेlएक सैद्धांतिक समस्या यह दिखाई देती है कि भारत में जो भी एनजीओ बने हैं वे केवल इंडियन सोसाइटी एक्ट के अंतर्गत ही पंजीकृत नहीं हैं बल्कि राज्यों के कानून तथा भारतीय कंपनी अधिनियम की धाराओं के तहत भी पंजीकृत होते हैंl कहने का तात्पर्य यह है कि एनजीओ के पंजीकरण के नियमों में विभिन्नता है जो कि गलत प्रतीत होता हैlएक समस्या यह भी दिखाई देती है कि अंग्रेजों के ज़माने से चले आ रहे इंडियन सोसाइटी एक्ट,1860 जैसे कानूनों की जटिलता को कम करना और उन्हें तर्कसंगत बनाना ज़रूरी हैlएनजीओ के विदेशी चंदे लेने संबंधी नियमों को भी प्रासंगिक बनाते हुए उन्हें सख्ती से लागू किये जाने की ज़रूरत को महसूस किया जाता रहा है क्योंकि खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक बहुत सारी विदेशी कंपनियाँ भारत में अपने हित साधने के लिये एनजीओ खोलकर अपने अनुकूल माहौल बनवाती हैंl साथ ही काले धन को भी सफेद करवाती हैंlकई देश भी भारत के आर्थिक विकास को अवरुद्ध करने हेतु भारत में एनजीओ खुलवाते हैं और उन्हें फंडिंग करते हैं जिसका कोई लेखा-जोखा नहीं होता और ये एनजीओ जल-जंगल-ज़मीन के नाम पर आदिवासियों को भड़काते भी हैं और माओवादी हिंसा भी करवाते हैंl

समाधान

सर्वप्रथम तो एनजीओ की बढ़ती संख्या को नियंत्रित करने हेतु इनके पंजीकरण के नियमों को सख्त किये जाने की ज़रूरत हैlजो एनजीओ बैलेंस शीट देकर अपना लेखा-जोखा न दें उनके खिलाफ वसूली के लिये सिविल और दीवानी कार्रवाई होlएनजीओ को नियमित करने, उनकी मान्यता व उन्हें फंड जारी करने से लेकर हिसाब- किताब लेने तक के दिशानिर्देश तय होंlएनजीओ को ऑडिट एकाउंट,  इनकम टैक्स रिटर्न के अलावा काम करने के क्षेत्र और मुख्य कार्यकर्त्ताओं की जानकारी देना बाध्य किया जाएlएनजीओ को उसके अंदरूनी कामकाज और नैतिक स्टैंडर्ड के मूल्यांकन के बाद ही मान्यता दी जाएlमान्यता देने के बाद एनजीओ को मिलने वाले फंड के इस्तेमाल के मूल्यांकन के लिये त्रिस्तरीय ( थ्री टियर) छानबीन होlफंड का दुरुपयोग करने वाले एनजीओ और स्वैच्छिक संस्थाओं के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जाएlहस्ताक्षरकर्त्ता सामूहिक रूप से फंड वापस करने के लिये जवाबदेह होlअगर सरकार किसी एनजीओ के प्रोजेक्ट से संतुष्ट नहीं होती या उसे लगता है कि गाइडलाइन का उल्लंघन हो रहा है तो तत्काल प्रभाव से फंड देने पर रोक लगाने का सरकार को अधिकार होना चाहियेlविदेशी चंदा विनियामक अधिनियम, 1976 राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा कानून है इसलिये इसे अत्यधिक सख्त बनाते हुए विदेशी चंदे पर निगरानी कड़ी करने की ज़रूरत हैlग्रामीण विकास मंत्रालय और कपार्ट को और अधिक चुस्त किये जाने की ज़रूरत है, क्योंकि कपार्ट को ही एनजीओ को सरकारी रकम देने तथा उसे ब्लैक लिस्ट करने का अधिकार हैlजो एनजीओ झूठी सूचनाओं के आधार पर सरकार से फंड ले, उसे ब्लैक लिस्ट किया जाना चाहियेlदेश के सभी एनजीओ को फिर से नीति आयोग में ऑनलाइन पंजीकरण कराना होगा और एनजीओ को एक यूनिक आईडी देने पर भी विचार किया जा सकता हैlकुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार सरकार को एनजीओ से संबंधित एक नया कानून लाने की ज़रूरत है जिसे सरकार ने भी स्वीकारा है और इस संदर्भ में काम हो रहा हैl कपार्ट (Council for Advancement of People`s Action and Rural Technology) जन सहयोग एवं ग्रामीण प्रौद्योगिकी विकास परिषद अर्थात् कपार्ट का गठन एक सितम्बर,1986 को किया गया थाl इसका मुख्यालय नई दिल्ली में हैl
इसका मुख्य कार्य ग्रामीण संवृद्धि के लिये परियोजनाओं के कार्यान्वयन में स्वैच्छिक कार्य को प्रोत्साहन देना और उसमें मदद करना हैl
कपार्ट ने 9 प्रादेशिक समितियाँ स्थापित की थीं जिन्हें अपने-अपने प्रदेशों में एनजीओ को 25 लाख रूपए तक के परिव्यय वाली परियोजनाओं को मंज़ूरी देने की शक्तियाँ प्राप्त थींl
कपार्ट की इन प्रादेशिक समितियों को मार्च 2012 में बंद कर दिया गया थाl
अब कपार्ट को फिर से ग्रामीण विकास मंत्रालय के अधीन पुनार्गठित कर कार्यरत किया गया हैl
कपार्ट की स्‍थापना दो ए‍‍जेंसियों को मिलाकर हुई है- 'काउंसिल फॉर एडवांसमेंट ऑफ रूरल टेक्‍नोलॉजी' (सी.ए.आर.टी) तथा पीपुल्‍स एक्‍शन फॉर डेवलपमेंट इंडिया (पी.ए.डी.आई)l
कहने का तात्पर्य यह कि कपार्ट देश के सभी 33 लाख एनजीओ को धन उपलब्ध कराने का ज़िम्मा नहीं रखती है बल्कि सिर्फ ग्रामीण विकास और कृषि से जुड़े गैर-सरकारी संगठनों को धन मुहैया करवाने वाली संस्था हैl

 निष्कर्ष
गैर-सरकारी संगठनों के प्रति भारतीय समाज की मुख्य शिकायतें विदेशी चंदा नियमन अधिनियम, 1976 एवं पंजीकरण के नियम के प्रावधानों का उल्लंघन, अपनी गतिविधियों तथा आय-व्यय का ब्यौरा न प्रस्तुत करना तथा सरकारी धन की हेराफेरी करना आदि हैl एनजीओ के इस तरह के कार्यों के परिणामस्वरूप देश को महत्त्वपूर्ण आर्थिक क्षति का सामना करना पड़ा है तथा एनजीओ के विकास  अभियानों से राष्ट्रीय सुरक्षा भी खतरे में पड़ी हैl सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी टिप्पणी में विगत अप्रैल में कहा था कि एनजीओ को दिया गया फंड जनता का पैसा हैl जनता के पैसे का हिसाब रखा जाना चाहियेl जो इसका दुरुपयोग करें उस पर कार्रवाई होनी ज़रूरी हैl इसलिये एनजीओ के नियमन हेतु नए सिरे से एक सख्त कानून की आवश्यकता है जिसे माननीय सर्वोच्च न्यायालय के साथ-साथ आम जन ने भी महसूस किया हैl अतः सरकार को इस दिशा में अविलम्ब महत्त्वपूर्ण कदम उठाने की ज़रूरत हैl

आपदा प्रबन्धन , PA 4tg sem Question1

आपदा प्रबन्धन
सूखा, बाढ़, चक्रवाती तूफानों, भूकम्प, भूस्खलन, वनों में लगनेवाली आग, ओलावृष्टि, टिड्डी दल और ज्वालामुखी फटने जैसी विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है, न ही इन्हें रोका जा सकता है लेकिन इनके प्रभाव को एक सीमा तक जरूर कम किया जा सकता है, जिससे कि जान-माल का कम से कम नुकसान हो। यह कार्य तभी किया जा सकता है, जब सक्षम रूप से आपदा प्रबंधन का सहयोग मिले। प्रत्येक वर्ष प्राकृतिक आपदाओं से सर्वाधिक प्रभावित होने वाले देशों में भारत का दसवां स्थान है।
परिचय
आपदा प्रबंधन के दो महत्वपूर्ण आंतरिक पहलू हैं। वह हैं पूर्ववर्ती और उत्तरवर्ती आपदा प्रबंधन। पूर्ववर्ती आपदा प्रबंधन को जोखिम प्रबंधन के रूप में जाना जाता है।
आपदा के खतरे जोखिम एवं शीघ्र चपेट में आनेवाली स्थितियों के मेल से उत्पन्न होते हैं। यह कारक समय और भौगोलिक – दोनों पहलुओं से बदलते रहते हैं। जोखिम प्रबंधन के तीन घटक होते हैं। इसमें खतरे की पहचान, खतरा कम करना (ह्रास) और उत्तरवर्ती आपदा प्रबंधन शामिल है।
आपदा प्रबंधन का पहला चरण है खतरों की पहचान। इस अवस्था पर प्रकृति की जानकारी तथा किसी विशिष्ट अवस्थल की विशेषताओं से संबंधित खतरे की सीमा को जानना शामिल है। साथ ही इसमें जोखिम के आंकलन से प्राप्त विशिष्ट भौतिक खतरों की प्रकृति की सूचना भी समाविष्ट है।
इसके अतिरिक्त बढ़ती आबादी के प्रभाव क्षेत्र एवं ऐसे खतरों से जुड़े माहौल से संबंधित सूचना और डाटा भी आपदा प्रबंधन का अंग है। इसमें ऐसे निर्णय लिए जा सकते हैं कि निरंतर चलनेवाली परियोजनाएं कैसे तैयार की जानी हैं और कहां पर धन का निवेश किया जाना उचित होगा, जिससे दुर्दम्य आपदाओं का सामना किया जा सके।
इस प्रकार जोखिम प्रबंधन तथा आपदा के लिए नियुक्त व्यावसायिक मिलकर जोखिम भरे क्षेत्रों के अनुमान से संबंधित कार्य करते हैं। ये व्यवसायी आपदा के पूर्वानुमान के आंकलन का प्रयास करते हैं और आवश्यक एहतियात बरतते हैं।
जनशक्ति, वित्त और अन्य आधारभूत समर्थन आपदा प्रबंधन की उप-शाखा का ही हिस्सा हैं। आपदा के बाद की स्थिति आपदा प्रबंधन का महत्वपूर्ण आधार है। जब आपदा के कारण सब कुछ अस्त-व्यस्त हो जाता है तब लोगों को स्वयं ही उजड़े जीवन को पुन: बसाना होता है तथा अपने दिन-प्रतिदिन के कार्य पुन: शुरू करने पड़ते हैं।
आपदा प्रबंधक के कार्य
आपदा प्रबंधकों को ऐसे प्रभावित क्षेत्रों में सामान्य जीवन बहाल करने का कार्य करना पड़ता है। आपदा प्रबंधन व्यावसायिक समन्वयक के रूप में कार्य करता है। यह सुनिश्चित करता है कि समस्त आवश्यक सहायक साधन और सुविधाएं सही समय पर आपदाग्रस्त क्षेत्र में उपलब्ध हैं, जिससे कम से कम नुकसान होता है।
यह प्रबंधक ऐसे विशेषज्ञ लोगों के समूह का मुखिया होता है, जिनकी सेवाएं आपदा के समय अनिवार्य होती हैं। जैसे-डॉक्टर, नर्स, सिविल इंजीनियर, दूरसंचार विशेषज्ञ, वास्तुशिल्प, इलेक्ट्रीशियन इत्यादि।
आपदा प्रबंधन की सबसे बड़ी चुनौती आपदाग्रस्त सीमा-क्षेत्र और होनेवाली क्षति का आंकलन करना है। इससे इस क्षेत्र का कार्य अत्यधिक वैज्ञानिक प्रक्रिया का रूप ले लेता है। आपदाग्रस्त क्षेत्रों की भौगोलिक एवं आर्थिक स्थितियों के कारण चुनौती और भी बढ़ जाती है।
आपदा अधिकार-क्षेत्र की तमाम सीमाएं लांघ सकती है। विपत्ति के समय अनजान कार्यों की जिम्मेदारी उठाने की आवश्यकता भी उत्पन्न होती है। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए विशेष कर्मियों की जरूरत होती है। इससे यह कार्य और अधिक कठिन हो जाता है।

लोककल्याणकारी राज्य की विशेषताएं

लोककल्याणकारी राज्य और भारत । Public Welfare State and India in Hindi Language!
1. प्रस्तावना ।
2. लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा ।
3. लोककल्याणकारी राज्य की विशेषताएं या लक्षण ।
4. लोककल्याणकारी राज्य के कार्य ।
5. लोककल्याणकारी राज्य और भारत ।
6. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

कुछ व्यक्तिवादी राज्य को आवश्यक बुराई मानते हैं और अपने सीमित अर्थ में उसके कार्यक्षेत्र को अधिक व्यापक नहीं बनाना चाहते । भूमि और जन के साथ निःसन्देह राज्य का होना अनिवार्य तत्त्व है ।
यह निश्चित रूप से सत्य है कि कोई भी राज्य अपने नागरिकों के लिए प्रत्येक क्षेत्र में सुख-सुविधाएं प्रदान करना चाहता है ।
अपने समस्त साधनों एवं शक्ति का उपयोग वह जनता की भलाई में करना चाहता है । यदि कोई राज्य इस तरह देश की सम्पूर्ण सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, कल्याणकारी योजनाओं को जनता को केन्द्र में मानकर लागू करता है, तो वह लोककल्याणकारी राज्य कहलाता है ।

2. लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा:

लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा अत्यन्त प्राचीनकाल से ही हमारे देश में रही है । प्राचीन युग में राज्य को नैतिक कल्याण का साधन माना जाता था । रामायण काल में तो राम-राज्य की अवधारणा इसी लोककल्याणकारी राज्य के सिद्धान्त पर आधारित थी ।
हमारे धार्मिक अन्यों में यहां तक लिखा है कि राजा अपनी प्रजा का हित नहीं चाहता और अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता, वह नरक का अधिकारी होता है । चाणक्य हो या फिर अरस्तु या प्लेटो, इन्होंने भी लोक कल्याण कारी राज्य की अवधारणा को महत्त्व दिया है ।
लोक कल्याण कारी राज्य से तात्पर्य किसी विशेष वर्ग का कल्याण न होकर सम्पूर्ण जनता का कल्याण होता है । इस तरह सम्पूर्ण जनता को केन्द्र मानकर जो राज्य कार्य करता है, वह लोक कल्याणकारी राज्य
है ।
लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के सम्बन्ध में इंसाइक्लोपीडिया ऑफ सोशल साइंसेस के विचार हैं: “लोककल्याणकारी राज्य से तात्पर्य ऐसे राज्य से है, जो अपने सभी नागरिकों को न्यूनतम जीवन रत्तर प्रदान करना अपना अनिवार्य उत्तरदायित्व समझता है ।”  प्रो॰ एच॰जे॰ लास्की के अनुसार: “लोककल्याणकारी राज्य लोगों का ऐसा संगठन है, जिसमें सबका सामूहिक रूप से अधिकाधिक हित निहित है ।”

3. लोककल्याणकारी राज्य की विशेषताएं या लक्षण:

लोककल्याणकारी के आदर्श स्वरूप के लिए निम्नलिखित लक्षण या विशेषताओं की आवश्यकता अनिवार्य है:
1.आर्थिक सुरक्षा:  इसके बिना लोककल्याणकारी राज्य का कोई महत्त्व नहीं है; क्योंकि सबके लिए रोजगार. न्यूनतम जीवन की गारण्टी, अधिकतम आर्थिक समानता होनी चाहिए । यदि शासन तन्त्र में राजसत्ता आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न लोगों के हाथों में होगी. तो वह लोककल्याणकारी राज्य की श्रेणी में नहीं आयेगा ।
2.राजनीतिक सुरक्षा की व्यवस्था:  लोककल्याणकारी राज्य को चाहिए कि वह ऐसी व्यवस्था करे कि राजनैतिक शक्ति सम्पूर्ण रूप से जनता के हाथ में हो । शासन व्यवस्था लोकहित में हो ।
3. सामाजिक सुरक्षा:  लोककल्याणकारी राज्य का प्रमुख लक्षण यह होना चाहिए कि वह सामाजिक सुरक्षा से साथ-साथ समाज में रंग, जाति, धर्म, सम्प्रदाय, वंश, लिंग के आधार पर भेदभाव न करे ।
4. राज्य के कार्यक्षेत्र में वृद्धि:  राज्य को लोककल्याण सम्बन्धी वे सभी कार्य करने चाहिए, जिससे नागरिकों की स्वतन्त्रता प्रभावित न हो और वे अपने कार्यक्षेत्र में पूर्ण क्षमता एवं स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य कर सके ।
5. विश्वशान्ति एवं वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना:  लोककल्याणकारी राज्य का स्वरूप राष्ट्रीय न होकर अन्तर्राष्ट्रीय होता है । अत: राज्य विशेष को चाहिए कि वह विश्वकल्याण की भावना से सम्पूर्ण मानवता के लिए कार्य करे ।
4. लोककल्याणकारी राज्य के कार्य:  लोककल्याणकारी राज्य के कार्य को मोटे तौर पर दो भागों: 1. अनिवार्य कार्य और 2. ऐच्छिक कार्य-में विभाजित किया जा सकता है । अनिवार्य कार्य तो प्रत्येक राज्य को अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए अनिवार्य रूप से करने पड़ते हैं । ऐच्छिक कार्य तो राज्य की परिस्थितियों एवं शासन के दृष्टिकोण पर निर्भर होते हैं ।
लोककल्याणकारी राज्य का दायित्व है कि वह ऐच्छिक व अनिवार्य दोनों को महत्त्व दे । लोककल्याणकारी राज्य के अनिवार्य कार्य हैं: 1. बाह्य आक्रमणों से राज्य की रक्षा करना । उस हेतु विभिन्न प्रकार के सैन्य उपकरणों एवं साधनों की भी व्यवस्था करना ।
2. राज्य का दूसरा अनिवार्य कार्य राज्य में शान्ति एवं सुव्यवस्था कायम करना, नागरिकों को कानून के तहत सुशासन प्रदान करना, पुलिस की व्यवस्था करना और नागरिकों के कर्तव्यों का नियमन करना है ।
3. लोककल्याणकारी राज्य को शान्ति और व्यवस्था बनाये रखने के लिए स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष न्याय की व्यवस्था करनी चाहिए ।
4. लोककल्याणकारी राज्य को स्त्री-पुरुष, बच्चों तथा उनके पारस्परिक सम्बन्धों का इस प्रकार नियमन करना चाहिए कि उनके बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न न हो । आर्थिक समानता के आधार पर नागरिकों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना राज्य का अनिवार्य कार्य है ।
5. लोककल्याणकारी राज्य का अनिवार्य कर्तव्य अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग और सद्‌भावना स्थापित कर विश्वशान्ति व वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को बढ़ाना है ।
6. सभी को शिक्षा के समान अवसर प्रदान करना, इसके साथ 14 वर्ष तक के लिए निःशुल्क अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा प्रदान करना । विश्वविद्यालय, तकनीकी, औद्योगिक, महिला, प्रौढ़ शिक्षा की समुचित व्यवस्था करना ।
7. नागरिकों के स्वास्थ्य रक्षा हेतु समुचित उपाय करना ।
8. उद्योग एवं व्यापार पर नियन्त्रण करना ।
9. कृषि की उन्नति हेतु राज्य को उत्तम बीज, खाद एवं सिंचाई के समुचित साधनों की व्यवस्था करना, कृषकों को कम ब्याज पर देना ।
10. यातायात एवं संचार के लिए सड़कों, रेलों, जल तथा वायुमार्गो, डाक, तार, टेलीफोन, रेडियो, दूरदर्शन आदि की व्यवस्था करना ।
11. श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए श्रमहितकारी कानून बनाना ।
12. शारीरिक रूप से अपंग एवं वृद्ध व्यक्तियों के लिए इस प्रकार शिक्षण और प्रशिक्षण की व्यवस्था करना कि वह अपनी जीविकोपार्जन स्वयं कर सकें । इसके लिए वृद्धों और अपंगों के लिए पेंशन इत्यादि की व्यवस्था करना ।
13. प्रत्येक राज्य में कला, साहित्य, विज्ञान को प्रोत्साहन देना ।
14. नागरिकों के लिए आमोद-प्रमोद व मनोरंजन की व्यवस्था करना ।
15. प्राकृतिक सम्पदा के अधिकाधिक उपयोग हेतु राज्य को प्रेरित करना ।
16. सामाजिक कुरीतियों में सती प्रथा, बालविवाह, बहुविवाह, अनमेल विवाह, दहेज प्रथा, मृत्युभोज, पर्दाप्रथा तथा धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध कानून बनाकर उसे समाप्त करना ।
17. बिना किसी भेदभाव के सभी नागरिकों को रोटी, कपड़ा, मकीन जैसी जीवनरक्षक आवश्यक व मूलभूत सुविधाएं प्रदान करना ।
18. सामाजिक परिवर्तन के साधन के रूप में राज्य के आर्थिक एवं सामाजिक विकास के लिए कार्य करना ।
19. आर्थिक नियोजन, निर्धनता का अन्त, उद्योग व्यापार एवं कृषि का नियमन एवं विकास करना ।

6. लोककल्याणकारी राज्य और भारत:

भारत एक लोककल्याणकारी राज्य है । प्राचीनकाल से लेकर वर्तमान काल तक इसी लोककल्याण की भावना का निरन्तर विकास होता रहा है । महात्मा गांधी, नेहरू, राममनोहर लोहिया, विनोबा भावे आदि ने भारत को लोककल्याणकारी राज्य बनाने हेतु विभिन्न प्रयास किये । स्व॰ इंदिरा गांधी ने बीस सूत्रीय कार्यक्रम लागू कर, स्व॰ राजीव गांधी ने भी लोककल्याणकारी राज्य के स्वप्न को आगे बढ़ाया ।
वर्तमान प्रधानमन्त्री भी इसी दिशा में कार्य कर रहे हैं । समाजवाद, धर्मनिरपेक्षतावादी, सच्चे लोकतन्त्र की स्थापना तथा अवसरों की समानता लोककल्याणकारी राज्य भारत के ही हैं । राज्य के नीति निर्देशक तत्त्व सिद्धान्त ऐसे दिशा निर्देश हैं, जो भारत को लोककल्याणकारी राज्य के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं ।

7. उपसंहार:

इस प्रकार स्पष्ट होता है कि लोककल्याणकारी राज्य जनता की भलाई के लिए ही कार्य करता है । लोककल्याणकारी राज्य अपनी नीतियों, सिद्धान्तों और आदर्शो में ऐसी परिस्थितियों का निर्माण करता है, जिससे व्यक्तिगत एवं सामूहिक कल्याण सम्भव हो सके ।
राज्य के नागरिकों को ऐसे पर्याप्त अवसर सुलभ हो सकें, जिससे वे अपना सर्वांगीण विकास कर सकें । लोककल्याणकारी राज्य अपने सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक सुरक्षा प्रदान करता है, जो सार्वजनिक हित, सार्वजनिक सुरक्षा एवं सार्वजनिक उत्थान के लिए समर्पित होता है ।

केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड question3

केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड

केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड की स्थापना 12 अगस्त, 1953 को भारत सरकार के एक प्रस्ताव द्वारा स्वैच्छिक संगठनों के माध्यम से महिलाओं, बच्चों एवं अपंगों के कल्याण कार्यक्रमों को लागू करने और समाज कल्याण गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से की गई थी। 1969 तक बोर्ड सरकार के एक अंग के रूप में कार्य करता रहा, तत्पश्चात् बोर्ड को वैधानिक दर्जा प्रदान करने के लिए इसे कपनी अधिनियम के अंतर्गत कल्याणकारी कपनी के तौर पर पंजीकृत किया गया। बोर्ड को दो जिम्मेदारियां सौंपी गई, एक तो समाज के वंचित वगों, विशेष रूप से महिलाओं और बच्चे,को कल्याण सेवाएं प्रदान कराना, और दूसरी ओर, स्वैच्छिक संगठनों का भी देशव्यापी विकास करना जिनके माध्यम से यह सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकें।

1954 में राज्यों और संघ क्षेत्रों में बोर्ड के कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए और कल्याणकारी सेवाओं के विस्तार तथा विकास में केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड की सहायता हेतु राज्य समाज कल्याण परामर्श बोर्ड स्थापित किए गए। राज्य बोडों की अनुशंसाओं पर विभिन्न योजनाओं के तहत स्वैच्छिक संगठनों को वित्तीय सहायता दी गई। वर्तमान में 32 राज्य बोर्ड हैं। झारखण्ड के राज्य बोर्ड का गठन हाल ही में किया गया है।

बोर्ड में एक 55 सदस्यों की सामान्य निकाय (जनरल बॉडी) तथा 15 सदस्यों वाली कार्यकारी समिति (एक्जीक्यूटिव कमेटी) होती हैं।

केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड के उद्देश्यः

1969 में कम्पनी अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत किए जाते समय केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड के निम्नलिखित उद्देश्यों का निर्धारण किया गया-

समाज कल्याण के क्षेत्र में कार्य करने वाले स्वयंसेवी संगठनों के निर्माण को प्रोत्साहित करना।समाज कल्याण से सम्बन्धित संगठनों की आवश्यकताओं एवं अपेक्षाओं का समय-समय पर संरक्षण, शोध और मूल्यांकन के माध्यम से समुचित अध्ययन करना।समाज के कमजोर वगों, जैसे- महिलाओं, वृद्धों, विकलांगों, बच्चों, रोगियों, आदि के कल्याण से प्रेरित विभिन्न सामाजिक कल्याण सम्बन्धी गतिविधियों को प्रोत्साहित करना।विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं एवं पंचायती राज संस्थाओं को भारत सरकार द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुरूप तकनीकी एवं वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना।अनुदान प्राप्त संगठनों के कार्यक्रमों एवं परियोजनाओं का मूल्यांकन करना।प्राकृतिक आपातकाल के समय राष्ट्र में कहीं भी सहायता पहुंचाने हेतु अपने संगठन के माध्यम से सहायता कार्यक्रमों का आयोजन करना।बोर्ड द्वारा बनाए गए समाज कल्याण से सम्बन्धित विभिन्न कार्यक्रमों एवं गतिविधियों के संचालन हेतु केन्द्रीय मंत्रालयों एवं राज्य सरकारों द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली सहायता में समन्वय करना।सामाजिक कार्य हेतु पहलकारी विभिन्न परियोजनाएं एवं प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन करना और उन्हें आवश्यक प्रोत्साहन प्रदान करना।

केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड का कार्यालय संगठन

केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड की स्थापना के समय (1953 में) इसके कार्यालय संगठन में मात्र6 सदस्य थे। इनमें एक सचिव, एक कार्यालय अधीक्षक, एक लेखाकार तथा तीन सहायक थे। किन्तु वर्तमान समय में बोर्ड का एक विशाल प्रशासनिक संगठन है। बोर्ड का अध्यक्ष इसका सर्वोच्च अधिकारी होता है तथा प्रशासनिक कार्यों के लिए भारत सरकार के उप-सचिव के स्तर के समतुल्य एक सचिव होता है। बोर्ड के प्रशासनिक कार्यों के सुचारू रूप से संचालन हेतु सम्पूर्ण संगठन को निम्नलिखित 9 संभागों में विभाजित किया गया है-
 

सामाजिक-आर्थिक संभाग: इस संभाग का दायित्व बोर्ड द्वारा चलाए जा रहे कार्यक्रमों के संचालन की देख-रेख करना है।सघन कार्यक्रम संभाग: इस संभाग द्वारा 18 से 30 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं को माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक परीक्षाओं में प्रविष्ट होने के लिए सहायता की व्यवस्था की जाती है।परियोजना संभाग: इस संभाग द्वारा परिवार एवं बच्चों के कल्याण सम्बन्धी कार्यक्रम, पोषण सम्बन्धी कार्यक्रम,बालवाड़ी कार्यक्रम, कामकाजी महिला छात्रावास परियोजनाओं एवं विभिन्न कार्यक्रमों से सम्बन्धित पुराने भवनों की मरम्मत हेतु अनुदान सम्बन्धी कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया जाता है।क्षेत्रीय परामर्श एवं निर्देशन संभाग: बोर्ड का यह संभाग के कार्यकरण पर सतत निगरानी रखने सम्बन्धी दायित्वों का वहन करता है।अनुदान संभाग: समाज कल्याण सम्बन्धी कार्यों में संलग्न स्वयंसेवी संस्थाओं एवं संगठनों की योजनावधि हेतु अनुदान इसी संभाग द्वारा स्वीकृत किए जाते हैं।आतंरिक नियंत्रण संभाग: यह संभाग देखता है कि बोर्ड द्वारा तैयार किए जाने वाले बजट में भारत सरकार द्वारा जारी किए गए दिशा-निर्देशों का समुचित पालन हो रहा है अथवा नहीं।वित्त एवं लेखा संभाग: इस संभाग का दायित्व बोर्ड के लिए आय एवं व्यय सम्बन्धी समस्त आहरण और वितरण सम्बन्धी कार्यों का संचालन करता है।प्रकाशन संभाग: या संभाग बोर्ड द्वारा प्रकाशित सोशल वेलफयर और समाज कल्याण-नामक क्रमशः अंग्रेजी एवं हिन्दी की पत्रिकाओं के प्रकाशन हेतु उत्तरदायी है।प्रशासन संभाग: इस संभाग द्वारा विभिन्न प्रकार के प्रशासनिक एवं कार्मिक उत्तरदायित्वों, जैसे- कार्मिकों की भर्ती, पद-स्थापन, स्थानान्तरण, पदोन्नति, प्रशिक्षण, आदिका निर्वहन किया जाता है।

राज्य समाज कल्याण बोर्ड

समाज कल्याण कार्यक्रमों से सम्बंधित प्रशासनिक तंत्र प्रत्येक राज्य में उनकी संरचना एवं कार्यक्रम व्याप्ति की दृष्टि से भिन्न-भिन्न है। विभिन्न राज्यों में कई समाज कल्याण सम्बन्धी कार्यक्रमों का संचालन विभिन्न विभागों द्वारा किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, बल अपराध को शिक्षा विभाग अथवा गृह विभाग अथवा समाज कल्याण विभाग द्वारा भी देखा जाता है। केन्द्र सरकार की भांति, राज्य सरकारें भी अपने-अपने राज्यों में स्वयंसेवी संगठनों को अनुदान देती हैं परन्तु समाज कल्याण क्षेत्र में उनकी क्रियाएं सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों पर ही आधारित होती हैं।

विभिन्न राज्यों एवं संघ शासित प्रदेशों में 32 राज्य बोर्ड हैं। इनकी अध्यक्षता अकार्यालयीय अध्यक्ष द्वारा होती है जो अधिकतर प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता होते हैं। बोर्ड में गैर-कार्यालयीय सदस्य होते हैं, जो सामान्यतः राज्य के प्रत्येक मुख्य जिले का प्रतिनिधित्व करते हैं और आनुपातिक रूप से केंद्रीय बोर्ड और राज्य सरकार द्वारा नामित किए जाते हैं।

राज्य बोर्ड केंद्रीय बोर्ड को राज्य स्तर पर स्वैच्छिकता के प्रोत्साहन एवं स्वैच्छिक कार्यवाही को बल प्रदान करने के लिए नए कदम उठाने की सलाह देते हैं। राज्य बोर्ड स्वैच्छिक संगठनों द्वारा बोर्ड के कार्यक्रमों को कार्यान्वित करने के मूल्यांकन के लिए एक अनुशंसित निकाय भी हैं।

राज्य बोर्डों की स्थापना पर खर्च होने वाला व्यय 50:50 के आधार पर होता है जिसमें 50 प्रतिशत सीएसडब्ल्यूबी द्वारा और शेष 50 प्रतिशत सम्बद्ध राज्य सरकार द्वारा वहन किया जाता है।

समाज कल्याण से सम्बद्ध कार्यक्रमों में राज्य स्तर पर एकरूपता लाने हेतु प्रत्येक राज्य में एकीकृत समाज कल्याण विभाग होना चाहिए। जो समाज कल्याण सम्बन्धी विषयों के संदर्भ में कार्य करे। तथापि समाज कल्याण एवं पिछड़े वर्गों के कल्याण के कार्यकारी तन्त्र अलग-अलग रखे जा सकते हैं क्योंकि पिछड़े वगों के कल्याण सम्बन्धी कार्यक्रम विकास के सम्पूर्ण क्षेत्र से सम्बन्ध रखते हैं और समाज कल्याण कार्यक्रमों से भिन्न प्रकार के होते हैं, जिसमें कल्याण का तत्व अधिक प्रबल होता है। इस समेकित विभाग द्वारा देखे जाने वाले विषय वही होने चाहिए जो केंद्र के समाज कल्याण विभाग के हों।

जिला स्तर पर समाज कल्याण सेवकों के विकास के निरीक्षण एवं पर्यवेक्षण हेतु एक जिला समाज कल्याण अधिकारी होना चाहिए। वर्तमान समय में जहां सम्भव हो, पंचायती राज संस्थाओं तथा नगरपालिका संगठनों का पूर्ण उपयोग कल्याण कार्यक्रमों को लागू करने की दिशा में किया जाना चाहिए। समाज कल्याण क्रियाएं सम्पादित करने हेतु स्पष्टतः निर्धारित कार्मिकों सहित इन संगठनों के अंतर्गत पृथक्-पृथक् खण्ड/अनुभाग होने चाहिए।

राज्य समाजकल्याण बोर्ड के कार्य

एक राज्य बोर्ड कै अध्यक्ष की नियुक्ति केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड के अनुमोदन पर सम्बद्ध राज्य सरकार करती है। इसलिए, अध्यक्ष की उत्प्रेरक के तौर पर केंद्रीय बोर्ड, राज्य बोर्ड और राज्य सरकार के बीच एक महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होती है।अध्यक्ष के निर्देश के तहत् राज्य बोर्ड को ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए जिससे सम्बद्ध राज्य सरकार के विभागों-सामाजिक कल्याण, महिला एवं बल विकास, ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा इत्यादि,-के साथ प्रभावी एवं नियमित समन्वय हो सके।स्वैच्छिक संगठनों के प्रस्तावों को अनुशंसित करते समय, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि राज्य के सभी जिलों का संपूर्ण प्रतिनिधित्व हुआ है और सुदूरवर्ती और दुर्गम क्षेत्रों या निम्न महिला एवं बल विकास संसूचकों तथा अन्य जिलों, जहाँ तुरंत हस्तक्षेप किए जाने की जरुरत हो, पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।राज्य बोर्ड में जिलों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व होना चाहिए, यदि किसी कारणवश कुछ जिले प्रतिनिधित्व नहीं करते तो इन्हें पास के जिलों के सदस्य को सौंपा जाना चाहिए।अध्यक्ष को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी कार्यक्रमों के अंतर्गत उप-समितियों में सदस्यों और साथ ही फील्ड ऑफिसर्स का प्रतिनिधित्व इस प्रकार होना चाहिए कि उनसे नियमित गुणात्मक आगत प्राप्त हो सके।यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बोर्ड की पूर्ण बैठक प्रत्येक तीन महीने के अंतराल पर नियमित रूप से आयोजित की जानी चाहिए। वित्त समिति की बैठक प्रत्येक 2 माह के नियमित अंतराल पर बुलायी जानी चाहिए और वितीय निहितार्थ के सभी प्रशासनिक मामलों को वित्तीय समिति के समक्ष इसके अनुमोदन हेतु प्रस्तुत किया जाना चाहिए।राज्य बोर्ड को सुनिश्चित करना चाहिए वित्त समिति के गठन में राज्य सरकार के वित एवं प्रशासन विभाग का प्रतिनिधित्व है।वित्त समिति से अनुमति मिलने के पश्चात्, राज्य बोर्ड का अध्यक्ष बोर्ड के कर्मचारियों की आय और प्रोत्साहनों का अनुमोदन करेगा।अध्यक्ष वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगा और इसे केंद्रीय बोर्ड और राज्य सरकार को सौंपेगा। यह रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने वाली तिथि से 30 दिनों के भीतर सम्बद्ध अधिकारियों तक पहुंच जानी चाहिए।राज्य बोर्डों के बेहतर निष्पादन तथा राज्य में वंचित महिलाओं एवं बच्चों के कल्याण हेतु केंद्रीय बोर्ड के अनुमोदन सहित कोई अन्य कार्य अध्यक्ष करता है।

समाज कल्याण का कार्यक्षेत्र अत्यंत व्यापक है और चूंकि राज्य सरकार ने अपने को मुख्य रूप से सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम तक ही सीमित रखा है, इसलिए कार्य स्वयंसेवी कल्याण संगठनों द्वारा ही किए जाते हैं। इनमें से जो संगठन दीर्घकालिक प्रकार के हैं वे राज्य समाज कल्याण द्वारा अनुदान प्राप्त करते हैं। इनमें से परामर्शदाता बोर्ड प्रत्यक्ष रूप से केन्द्रीय समाज कल्याण बार्ड से सम्बन्धित होता है।

समाज कल्याण प्रशासन की प्रमुख परिभाषाएं question 1

समाज कल्याण प्रशासन की प्रमुख परिभाषाएं निम्नवत् है :
जॉन किडनार्इ (1957) समाज कल्याण प्रशासन सामाजिक नीति को समाज सेवाओं में बदलने की एक प्रक्रिया है। राजा राम शास्त्री (1970) सामाजिक अभिकरण तथा सरकारी कल्याण कार्यक्रमों से संबंधित प्रशासन को समाज कल्याण प्रशासन कहते है। यद्यपि इसकी विधियाँ, प्रविधियाँ, तौर-तरीके, इत्यादि भी लोक प्रशासन या व्यापार प्रशासन की ही भाँति होते है। किन्तु इसमें एक बुनियादी भेद यह होता है कि इसमें सभी स्तरों पर मान्यताओं और जनतंत्र का अधिक से अधिक ध्यान रखते हुए ऐसे व्यक्तियों या वर्ग से सम्बन्धित प्रशासन किया जाता है जो बाधित होते है। डनहम (1949) समाज कल्याण प्रशासन को उन क्रिया कलापों में सहायता प्रदान करने तथा आगे बढाने में योगदान देने के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो किसी सामाजिक संस्था द्वारा प्रत्यक्ष सेवा करने के लिए अनिवार्य है।

कल्याण प्रशासन के प्रमुख क्षेत्र

महिला कल्याण:केन्द्र और प्रान्तिय सरकारों तथा केन्द्र शासित प्रदेशों ने महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए अनेक कार्यक्रम आरम्भ किये और महिला दशक में उनकी सातत्यता को बनाये रखने के लिए, उनकी प्रगति और प्रसार के प्रयासों को तेज किया। बहुत सी प्रदेश की सरकारों ने आरम्भिक बाल सेवाओं के समेकित प्रदान की भूमिका को पहचानते हुए अपने प्रदेशों में केन्द्र द्वारा समर्थित समेकित शिशु विकास सेवाओं को उनके क्रियान्वयन के लिए लिया। इनका प्रभाव शिशु ओं और मताओं इन सब के जीवन पर पड़ा है जिसका प्रमाण जन्म के समय शिशु का भार बढ़ना, अपोषक अहार की घटनाओं में कमी उतना, टीकाकरण में वृद्धि होना, शिशु मृत्यु दर का घटना तथा जन्म और मृत्यु दरों में घटाव है।

बाल कल्याण:प्रत्येक वर्ष श्री जवाहरलाल नेहरू का जन्म दिन 14 नवम्बर को प्रत्येक वर्ष बाल दिवस के रूप में मनाया जाता हैं। बाल कल्याण बच्चों के प्रति राष्ट्रीय चिन्ता बच्चों के अधिकारों एवं उनके प्रति सरकार, समाज एवं परिवार के दायित्वों से सम्बन्धित एवं विधायी प्रावधानों से परिलक्षित है संविधान के अनचुछेद 15 में अंकित है कि 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को किसी कारखाने अथवा खान अथवा किसी अन्य खतरनाक रोजगार में नही लगाया जायेगा। राज्य नीति के निर्देषक सिद्धान्तों की धारा 39 में इस बात को सुनिष्चितकिया गया है कि आर्थिक आवश्यकता से बाध्य होकर बच्चों को उनकी आयु एवं शक्ति के आयोग किसी व्यवसाय में कार्य न करना पडे़। इसमें यह भी वर्णित है कि बच्चों को स्वतंत्रता की स्थितियों में स्वस्थ्य ढ़ग से विकसित होने के अवसर एवं सुविधायें दी जाएँ तथा बचपन एवं यौवन की शोषण एवं नैतिक एवं भौतिक परित्याग से रक्षा की जाए। धारा 45 के अंतर्गत राज्यों से 14 वर्ष के आयु के सभी बच्चों के लिए निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के लिए कहा गया है।
राष्ट्रीय बाल नीति:विभिन्न पंचवष्रीय योजनाओं की विषय वस्तु बच्चों के प्रति सरकार की नीति का महत्वपूर्ण दर्पण है। प्रथम चार पंचवर्षिय योजनाओं से प्राप्त अनुभव, स्वतंत्रता उपरांत अनेक विभिन्न समितियों यथा भारत सरकार के द्वारा 1959 में नियुक्ति स्वास्थ्य सर्वे एवं नियोजन समिति, केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड द्वारा 1960 में स्थापित समाज कल्याण एवं पिछड़े वर्गो के कल्याण पर अध्ययन दल, समाज कल्याण विभाग द्वारा 1967 में नियुक्ति बाल कार्यक्रम-निर्माण समिति, शिक्षा आयोग 1964, शिक्षा मंत्रालय के द्वारा स्थापित पूर्व स्कूली बच्चों के बारे में अध्ययन समूह, की सिफारिषों, विकालांग बच्चों से सम्बन्धित स्वयं सेवी अभिकरणों सेविका/पर्यवेक्षक करती है।

समेकित बाल विकास सेवा योजना की प्रशासनिकइकार्इ ग्रामीण/आदिवासी क्षेत्रों में ब्लाक। तालुका और शहरी क्षेत्रों में वार्डो गन्दी बस्तियों का समूह होती है।

सयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय बाल आपात निधि (यूनिसेफ) परामर्श सेवा, प्रशिक्षण, संचार, आपूर्ति, उपकरण, प्रबोधन, अनुसंधान और मूल्यांकन के क्षेत्र में समेकित बाल विकास सेवा कार्यक्रम को सहायता प्रदान कर रहा है। नोराड (नार्वे एजेन्सी फार डिवलपमेंट) उ0 प्र0 के तीन जिलों अर्थात् लखनऊ, मिर्जापुर और रायबरेली में 31 समेकित बाल विकास परियोजनाओं को सहायता दे रहा है। यू0 एस0 ए0 आर्इ0 डी0 गुजरात के पंचमहल जिले में 11 समेंकित बाल विकास सेवा परियोजनाओं और महाराष्ट्र के चन्द्रपुर जिले में 10 समेकित बाल विकास सेवा परियोजनाओं को सहायता दे रहा है। कुछ समेकित बाल विकास सेवा परियोजनाओं को पूरक पोषाहार के लिए ‘‘केयर’’ और विश्व खाद्य कार्यक्रम की सहायता का भी उपयोग किया जा रहा है।

वृद्धों के कल्याण की आवश्यकता: संयुक्त राष्ट्र संघ ने वृद्धों कें प्रति अपनी चिंता को व्यक्त करते हुए 1982 के दौरान वियना में आयोजित विश्व युद्ध महासभा में वृद्धो के लिए अंतर्राष्ट्रीय कार्य योजना अंगीकृत की थी। सयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार, वर्ष 2.25 में विश्व में वृद्धों की जनसंख्या 1.2 विलियन हो जायेगी, जिनमें से लगभग 71 प्रतिशतविकासशील प्रदेशों में होगी। 1950 एवं 2025 के मध्य विकासशील एवं विकसित प्रदेशों में 80 वर्ष के ऊपर के वृद्धों की संख्या से दोगुनी हो जायेगी। क्योंकि महिलाओं की आयु पुरूषों से अधिक होती है, अतैव वृद्धो में महिलाओं का बाहुल्य होगा। यह सभी प्रवृत्तियों राष्ट्रीय सराकरों से मुख्य नीति संशोधन की माँग करती है।

पेंशन न्यास कोष :चतुर्थ वेतन आयोग को पेंशन की नयी विचारणा का एक सुझाव ‘काँमन को’ द्वारा दिया गया था। इस विचारणा में एक पेंशन न्यास कोष को विकसित करने का विचार निहित है। इस कोष में सरकार कर्मचारी की सेवा अवधि के अनुपात में पेंशन का अनुवर्ती भुगतान अथवा सेवा निवृत्ति पर उसकी कुल पेंशन का भुगतान करेगी। यह न्यास कम से कम 10 प्रतिशत ब्याज की गारण्टी देगा, जो पेंशन भोगी को मासिक भुगतान के रूप में मिलेगी। जब कभी महँगार्इ भत्ते की नयी किश्त दी जायेगी तो पेंशन भोगी के खाते में जमा कर दी जायेगी। कोष का प्रबन्ध न्याय मंडल द्वारा किया जायेगा जिसमें ख्यााति प्राप्त एवं निवेश अनुभवी लोग होंगे। पेंशन न्यास निधि के अनेक लाभ है। सर्वप्रथम एवं सर्व महत्वपूर्ण यह पेंशन भोगी को अथवा उसकी विधवा को पेंशन पाने के लिए विभिन्न प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए चक्कर नही काटने पडे़गे। इससें पेंशन निर्धारण भुगतान एवं लेखा रखने हेतु विविध स्थापनों पर हुये विशाल व्यय की बचत होगी। न्यास के क्रियान्वन की प्रक्रिया इतना सरलीकृत किया जा सकता है जिससें सारा कार्य थोड़े से स्टाफ द्वारा पूरा किया जा सके। इसके अतिरिक्त, सरकार न्यास निधि को लाभदायक विकासीय उद्देश्यों हेतु प्रयोग कर सकती है।

हैल्पेज इंडिया : हैल्पेज इंडिया वृद्धों को देखभाल प्रदान करने के कार्यक्रमों में संलग्न प्रादेशिक स्वयं सेवी संगठनों के व्यक्तियों को प्रशिक्षण भी प्रदान करती है। इसके अतिरिक्त यह वृद्ध देखभाल परियोजनाओं हेतु तकनीकि विशेष ज्ञता भी प्रदान करती है। अपने प्रारम्भ में इसने लगभग 10 करोड़ की लागत से 700 ऐसी परियोजनाओं को प्रयोजित किया है। हैल्पेज स्वयं ऐसी परियोजनाओं को परिचालित नही करता, यह प्रादेशिक वृद्धायु स्वयंसेवी संगठनों को तकनीकि एवं वित्तिय सहायता के द्वारा ऐसी परियोजनाओं के द्वारा एवं कार्यक्रमों के संचालन में सहायता करता है। हैल्पेज के द्वारा प्रबंधित केवल चलती फिरती मैडीकेयर युनिट का संचालन है जो नर्इ दिल्ली की झुग्गी झोपड़ियों में 150 से 200 रोगियों को प्रतिदिन मैडीकेयर सुविधाएँ प्रदान करती है।

भारत में हेल्पेज इंडिया की स्थापना 1980 में की गर्इ थी जिसके लक्ष्य एवं उद्देश्य थे - 50 वर्ष से ऊपर के आयु के पुरूषों एवं स्त्रियों को निवासिय, आवासीय एवं संस्थागत सुविधाओं के माध्यम से शैक्षिक, मनोरंजनात्मक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक सेवाएँ प्रदान करना, मेडिकल सेवाओं, अर्द्धकालिक रोजगार आय वृद्धि हेतु, भ्रमणों एवं यात्राओं की व्यवस्था, करों, सम्पत्ति, पेंशनी एवं अन्य आर्थिक तथा वित्तिय आवश्यकताओं हेतु व्यवसायिक परामश्रीय सेवाओ की व्यवस्था करना, वृद्धों की समस्या के बारे में अध्ययन एवं अनुसंधान कराना, एवं अध्ययन केन्द्रों, गोष्टियों, मनोरंजनात्मक समारोहों, रैलियों आदि की व्यवस्था करना तथा एवं युवा पीढ़ियों के मध्य बेहतर सामाजिक एकीकरण एवं सद्भावना हेतु उचित वातावरण तैयार करना।

वृद्धायु आवास गृह : केन्द्रीय एवं राज्य सरकारों, नगरपालिकाओं, परोपकारी समितियों, स्वयंसेवी संगठनों एवं अन्य वरिष्ठ नागरिक कल्याण समितियों ने वृद्ध एवं बुजुर्ग नागरिकों के लिए आवासीय सुविधाओं एवं अन्य सम्बद्ध आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए गृहों, शारीरिक एवं मानसिक गतिविधियों तथा अकेले पन को दूर करने एवं अन्य लोगों के साथ अन्तक्रिया करने एवं सम्पर्क बनाने हेतु मनोरंजन स्थलों की व्यवस्था की है। इस समय देशमें अधिकांशतया नगरीय क्षेत्रों में लगभग 300 ऐसे गृह है। इनसे कुछ एक का जिन्होने प्रशंसनीय कार्य किया है का वर्णन निम्नलिखित है-

अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों का कल्याण : हरिजनों की अधिकांष संख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। कुछ समय पूर्व तक हरिजन अपनी बस्ती से बाहर निकलने का साहस नही कर पाता था परन्तु देषके कुछ एक भागों में कृषि विकास (विषेश तया हरित क्रान्ति), कुछेक प्रदेशों में औद्योगिक प्रगति, तेजी से बढ़ते हुए नगरीय करण एवं जनमानी प्रणाली के विघटन के कारण हरिजन गतिषील वर्ग बन गये है सभी अनुसूचित जाति श्रमिको का लगभग 52 प्रतिशत कृषिगत श्रमिक है तथा 28 प्रतिशतलघु एवं सीमान्त कृषक है एवं फसल सहभागी हैं। देशके पश्चिम भाग में लगभग सभी बुनकर अनुसूचित जातियों से है एवं पूर्वी भाग में सभी मछुवारे अनुसूचित जाति के है। कुछ गंदे व्यवसाय यथा झाडू लगाना, चमड़ा उतारना, तथा परिषोधन तथा चमड़ी उतारना पूर्णतया अनुसूचित जातियों के लिए है। नगरीय क्षेत्रों में रिक्शा चालको, ठेला चालको, निर्माण श्रमिकों, बीड़ी क्रमिकों एवं अन्य असंगठित गैर-कृषि श्रमिकों तथा नगरीय सफार्इ कर्मिकों, की पर्याप्त संख्या अनुसूचित जातियों से सम्बद्ध रखती है। वे उन निर्धनों में जो गरीबी रेखा से नीचे रहते है, में सबसे निर्धन है।यद्यपि जनसंख्या के अन्य वर्गो में भी निर्धन एवं दलित है तदपि घोर निर्धनता, असामान्य अज्ञानता एवं गठन अन्धविश्वास में डूबी हुर्इ जनसंख्या की अधिक भाग अनुसूचित जातियों में से है। वंचित लोगों में भी हरिजन ही शताब्दियों तक दासत, अपमान एवं नितांत विवशता का जीवन व्यतीत करते रहै है।

अनुसूचित जाति विकास निगम : अनुसूचित जाति विकास निगम के सम्मेलन में समाज कल्याण/अनुसूचित जाति कल्याण विभागों के सचिवों, अनुसूचित जाति विकास निगमों के वरिष्ठ अधिकारियों एवं प्रबन्धक निदेशकों, भारतीय रिजर्व बंकै , भारतीय स्टेट, नाबार्ड, जमा बीमा एवं ऋण गारण्टी निगम एवं बैकिंग संस्थानों, कल्याण मंत्रालय एवं ग्रामीण विकास विभाग, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग के प्रतिनिधित्व तथा अनुसूचित जनजाति आयुक्त ने भाग लिया। इस सम्मेलन का विषय था, अनुसूचित जाति विकास निगम के माध्यम से अनुसूचित जातियों के परिवारों के आर्थिक विकास हेतु सहायता की नयी प्रणाली जिसे सीमान्त धन ऋण कार्यक्रम के विकल्प रूप में विकसित किया गया था।

संवैधानिक सुरक्षा : संविधान में अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों एवं अन्य कमजोर वर्गो के लिए विशेष तौर पर अथवा नागरिक रूप से उनके अधिकारों को मान्यता देकर उनके शैक्षिक एवं आर्थिक हितो का विकास करने एवं उनकी सामाजिक आयोग्यताओं को दूर करने हेतु सुरक्षाएँ प्रदान की गर्इ है। मुख्य सुरक्षाएँ है-
अस्पृष्यता उन्मूलन एवं किसी भी रूप मे इसके अभ्यास पर प्रतिबन्ध, (धारा 17) उनके शैक्षिक एवं आर्थिक हितों की उन्नति एवं सामाजिक अन्याय एवं शोषण के सभी रूपों से उनकी सुरक्षा, (धारा 46) सार्वजनिक स्वरूप की हिंदू धार्मिक संस्थाओं को सभी वर्गो एवं श्रेणियों के लिये खोल देना (25 बी) . दुकानों, जन भोजनालयों, रेस्टोंरेन्टों एवं सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों, कुओं, तलाबों, स्नानघाटों, सड़कों एवं सार्वजनिक विश्राम स्थानों जो पूर्णतया अथवा आंशिक रूप में राज्य कोष से सहायता प्राप्त करते है अथवा जन प्रयोग के लिए समर्पित कर दियें है, के प्रयोग के बारे में किसी अयोग्यता, बाधा अथवा शर्त की समाप्ति (धारा 15 (2)), अनुसूचित जातियों के हित में सभी नागरिकों को स्वतन्त्रापूर्वक घूमने, बसने अथवा सम्पत्ति प्राप्त करने के सामान्य अधिकार पर कानून के द्वारा प्रतिबन्ध (19 (5), संविधान में अनुसूचित जनजातियों के हितों के संरक्षण एवं वर्द्धन हेतु विभिन्न सुरक्षाओं की व्यवस्था है। अनुच्छेद 19, 46, 164, 244, 330, 332, 334, 338, 349, 342, तथा संविधान की पाँचवी एवं छठी अनुसूचियाँ इस विशय पर प्रासंगिक है। भारत सरकार कर दायित्व इस मामले में केवल उनके विकास के लिए वित्तिय व्यवस्था करने से ही समाप्त नही हो जाता अपितु यह राज्य सरकारों के सहयोग एवं परामर्श से उनके शीघ्र एवं समन्वित विकास हेतु नीतियों एवं कार्यक्रमों का भी निर्णय करती है।                            संविधान के निर्देषों के परिपालन में केन्द्रीय एवं राज्य सरकारों ने स्वातंत्रता प्राप्ति के बाद निम्नलिखित अधिनियम पारित किये है-

प्रषासनिक संगठन : श्रम मंत्रालय

श्रमनीति एवं श्रम कल्याण से सम्बन्धित अधिनियमों को श्रम मंत्रालय, भारत सरकार एवं राज्य सरकारों के श्रम विभागों द्वारा क्रियान्वित किया जाता है। श्रम मंत्रालय कैबिनेट मंत्री/राज्य मंत्री/स्वतंत्र प्रभार के अधीन कार्य करता है। भारत सरकार का कोर्इ एक सचिव प्रशासकीय अध्यक्ष होता है जिसकी सहायतार्थ एवं अतिरिक्त सचिव, चार संयुक्त सचिव, एक महानिदेषक तथा अन्य वरिष्ट एवं कनिष्ट अधिकार होते है।

श्रम मंत्रालय के कार्य :

मंत्रालय श्रम मामलों यथा औद्योगिक सम्बन्धो, श्रम एवं प्रबन्ध के मध्य सहयोग, वेतन एवं सेवा की अन्य शर्तो को नियमन, सुरक्षा, श्रम कल्याण, सामाजिक सुरक्षा आदि से सम्बन्धित नीति का निर्माण करने के लिए उततरदायी है। श्रम नीति का क्रियान्वन केन्द्रीय सरकार के द्वारा निर्देशन एवं नियंत्रण के अधीन राज्य सरकारों का दायित्व है। रेलवे, खानों, तेल क्षेत्रों, प्रमुख बन्दरगाहों, बैकों, बीमा कम्पनियों तथा अन्य जो संघ सूची में वर्णित है, राज्य सरकार के क्षेत्र में नही आते है। मंत्रालय कर्मचारी राज्य बीमा कानून, 1948 कर्मचारी भविष्य निधि कोष एवं विधि व्यवस्थाओं कानून, 1952 के अधीन सामाजिक सुरक्षा स्कीमों के क्रियान्वयन तथा बीड़ी उद्योग एवं खान (कोयला खानों को छोड़कर) श्रमिकों के कल्याण कोषों के प्रबन्ध के लिए सीधा उत्तरदायी है। यह राज्य सरकारों की श्रम मामलों के बारे में गतिविधियों को समन्वित करता है तथा आवश्यकता के समय परामर्श देता है। यह व्यक्तियों को उनकी रोजगार क्षमता बढ़ाने हेतु प्रशिक्षण सुविधाएँ भी प्रदान करता है। यह अन्तर्राश्ट्रीय श्रम संगठन एवं अन्य अन्तर्राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा संगठन के सम्बन्धित सभी गतिविधियों के लिए आदर्श संगठन के रूप में कार्य करता है। यह सम्मेलनों एवं बैठकों में सहभागिता को समन्वित करता है तथा अन्तर्राष्ट्रीय एवं इन संस्थाओं की सिफारिशों को क्रियान्वित करने के लिए उत्तरदायी है।

समाज कल्याण प्रशासन का वर्गीकरण

भारत में समाज कल्याण का कार्य प्राचीन काल से ही शैक्षिक आधार पर ही होता आया है। मध्य काल में कतिपय शासकों द्वारा जनहित में कुछ कार्य किये जाते थे। स्वतंत्रता के पश्चात् भारत ने कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को स्वीकार किया तथा जनहित को शासन का दायित्व स्वीकार किया गया। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र व अन्य संगठनों तथा प्रजातांत्रिक देशों ने समाज कल्याण हेतु अनेक कार्यक्रम चलाये। वर्तमान में भारत में विभिन्न समाज कल्याण योजनाओं को उनके प्रशासनिकवर्गीकरण के आधार पर निम्न वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-
अंतर्राष्ट्रीय समाज कल्याण प्रशासन केन्द्रीय समाज कल्याण प्रशासन राज्य स्तरीय समाज कल्याण प्रशासन शासन द्वारा सहायता प्राप्त अनुदान द्वारा समाज कल्याण करने वाली पंजीकृत गैर सरकारी संस्थाओं का प्रशासन अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा सहायता प्राप्त अनुदान द्वारा समाज कल्याण करने वाली पंजीकृत गैर सरकारी संस्थाओं का प्रशासन 6. निजी संस्थाओं के द्वारा किये जाने वाले समाज कल्याण का प्रशासन स्वैच्छिक संस्थाओं द्वारा किये जाने वाले समाज कल्याण का प्रशासन

समाज कल्याण प्रशासन की प्रक्रिया

समाज कल्याण प्रशासन प्रक्रिया में प्रक्रिया समान उद्देश्य प्राप्ति के लिए समूह के पारस्परिक प्रयत्नों को सुविधाजनक बनाती है। प्रशासन प्रक्रिया निम्नाकिंत प्रकार के कार्यो के लिए प्रयोग में लार्इ जाती है।
प्रशासनिक विधि, प्रक्रिया, कार्य की प्रगति और फल-प्राप्ति का समय-समय पर मूल्यांकन होना चाहिए। संस्था के उद्देश्यों और कार्यक्रमों संबंधी आँकड़े इकट्ठे करके निर्णय लेने में सहायता करना। उपलब्ध आँकड़ों के आधार पर आवश्यकताओं का विश्लेषण करना।पूर्वानुमान के आधार पर संस्था के कार्य के लिए बहुत सी वैकल्पिक तकनीकों या प्रक्रियाओं में से एक का चुनाव करना। वैकल्पिक प्रक्रिया के प्रयोग के द्वारा संस्था की परियोजनाओं को क्रियान्वित करने की व्यवस्था करना। संस्था के कार्य के आधार के अनुरूप आवश्यक कर्मचारियों की भर्ती, प्रशिक्षण, पर्यवेक्षण, कार्य-बँटवारा आदि की व्यवस्था करना। संस्था की उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए समुचित उपायों, क्रिया विधियों और तकनीकों के निरंतर प्रयोग की व्यवस्था करना। कार्य-विधि के दौरान कार्य को सुदृढ़ बनाने के लिए आकड़ों का संग्रह, अभिलेखन और विश्लेषण करना। सार्वजनिक धनराशि के सदुपयोग के हेतु वित्तिय क्रियाविधियों का निर्धारण करना और उनको क्रियान्वित करना। संचार और प्रभावशाली जन-सम्पर्क की व्यवस्था करना। समय-समय में कार्य और प्रयोग में लार्इ जाने वाली विधियों का मूल्यांकन करवाना।
वित्तीय प्रक्रिया : यद्यपि संस्था के वित्त्ाीय मामलों का दायित्व प्रबंध-समिति पर होता है, जो कोषाध्यक्ष के माध्यम सें इसे कार्यान्वित करती है, तथापि बजट बनाने में संस्था के मुख्य कार्यपालक को पहल करना चाहिए। यदि संस्था के अनेक अनुभाग अथावा शाखायें हो तो उन सब के अनुमानित व्यय का ब्यौरा प्राप्त करना चाहिए और फिर उसका इकट्ठा विवरण तैयार करना चाहिए। कर्मचारी वर्ग और कार्यकत्त्ााओं की चाहिए वे कार्यालय में अगामी वर्ष के कार्यक्रमों संबंधी विित्त्ाय आवश्यकताओं के विषय में संपूर्ण टिप्पणी रखते जायँ। ऐसा करते समय, संस्था के विित्त्ाय स्त्रोतों की क्षमता और कार्यक्रमों के विस्तार और सुधार के प्रस्तावों को ध्यान में रखना चाहिए।

उपलब्ध सामग्री के आधार पर बजट के मसविदे पर कर्मचारियों की बैठक में विचार करने के बाद उसे अंतिम रूप देकर कोषाध्यक्ष के द्वारा प्रबंध समिति के सामने पेश किया जाना चाहिए। प्रबंध समिति के द्वारा अनुमोदित बजट की सामान्य सभा से स्वीकृति प्राप्त की जानी चाहिए। प्रबंध समिति के द्वारा बजट उप समिति बनार्इ जानी चाहिए, जिसमें विित्त्ाय मामलों के विशेष ज्ञ, लेखा निरीक्षण, लेखाकार तथा मूल्यांकन पद्धति का ज्ञान रखने वाले व्यक्ति होने चाहिए। कोषाध्यक्ष इस समिति का प्रधान और मंत्री इसका मंत्री होना चाहिए।

बजट बनाने से पहले संस्था के आय व्यय का ब्यौरा मदों के अनुसार बनाना चाहिए। बजट के दो भाग होते है आय और व्यय। बजट निम्नलिखित खण्डों में बनाया जाना चाहिए :-
पिछले वर्ष का अनुमानित आय-व्यय। पिछले वर्ष का वास्तविक आय-व्यय। चालू वर्ष का वास्तविक आय-व्यय। अगामी वर्ष का अनुमानित आय-व्यय।
बजट के साथ व्याखात्मक टिप्पणी तैयार करनी चाहिए, जिसमें पिछले वर्ष से अधिक और कम अनुमानों के कारा दिये जाने चाहिए और यह भी बताया जाना चाहिए कि मदों पर अतिरिक्त व्यय के लिए धन कहाँ से प्राप्त किया जाये। यदि कोर्इ नया कार्यक्रम चालू करना हो अथवा वर्तमान कार्यक्रम में सुधार अथवा विस्तार करना हो, तो उसके लिए अनुमानित व्यय के सबंध में व्याख्यात्मक टिप्पणी देना चाहिए।

समाज कल्याण प्रशासन का इतिहास

प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता, कुशलता तथा सामाजिक परिस्थितियों के कारण एक दूसरे से भिन्न अस्तित्व रखता है। वह अपनी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकता है। उसे अन्य व्यक्तियों की सहायता लेनी ही पड़ती है जिसके परिणामस्वरूप सामूहिक आवश्यकताओं का जन्म होता है। व्यक्ति की ये आवश्यकतायें एक दूसरे को सहायता प्रदान करने के सिद्धान्त पर संगठित करती हं ै तथा उनमें एकमतता, सामूहिकता तथा सहयोग की भावना का विकास करती हं ै जो एक सभ्य समाज की आधारशिला है। प्रारम्भ में समाज कल्याण के विकास में धर्म के नाम पर दिए जाने वाले दान की संगठित व्यवस्था का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इसके बाद आवश्यकताग्रस्त सदस्यों की सहायता के लिए व्यावसायिक संघों की पारस्परिक सहायता समितियों की प्रमुख भूमिका रही है। इसके बाद शहरों का विकास होने पर नगरपालिकाओं द्वारा आवश्यकताग्रस्त लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति की जाने लगी जो बाद में राज्य के दातव्य संगठनों के रूप में परिवर्तित हो गर्इ। इसके अतिरिकत जाँन हावड्र, एलिजावेथ फ्रार्इ, जोसफीन ब्टलर, फ्लोरेन्स नाइटिंगेल जैसे समाज सुधारकों के प्रयासों के कारण सामाजिक सहायता के समाधान का विकास हुआ। अंग्रेजी निर्धन कानून का निर्माण समाज के निर्बल वर्गों की समस्याओ के समाधान में राज्य के उत्तरदायित्व की चेतना के विकास का प्रतिनिधित्व करता है और साथ-साथ इस बात को भी सामने लाता है कि केवल सहायता मात्र से कल्याण के लक्ष्यों की प्राप्ति नहीं हों सकती। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में चलाए गए दान संगठन आन्दोलन का उद्देश्य निर्धनों की स्थिति में सुधार और इस कार्य में लगे हुए संगठनों में समन्वय स्थापित करना था।

भारतवर्ष में प्राचीन काल से ही व्यक्तियों को सहायता प्रदान करने अथवा सेवा की भावना के महत्व का अनुभव किया गया था। गीता के अनुसार सृष्टि के आरम्भ में ब्रºमा ने त्याग के साथ मनुष्य की रचना करने के बाद कहा कि पारस्परिक बलिदान तथा पारस्परिक सहायता से उनका विकास तथा उनकी समृद्धि एवं वृद्धि होगी। यह त्याग कामधेनु के समान है जो सभी इच्छित वस्तुओं को प्रदान करेगा (बनर्जी, 1967:150)। भारतीय दर्शन में यज्ञ को बहुत महत्व दिया गया है जिसका अर्थ ऐसी किसी भी सामाजिक, राष्ट्रीय अथवा व्यक्तिगत क्रिया से है जिसमें व्यक्ति सेवा की भावना से अपने को पूर्ण रूप से लगाने के लिए तैयार है। समाज कल्याण में सेवा की भावना का सर्वोपरि स्थान है। पंचतन्त्र में यह ठीक ही कहा गया है, ‘सेवा धर्म परम गहनो योगिनाम् प्रिय गम्य:’ और इसीलिए जो व्यक्ति सेवा की भावना से, लाभ की भावना से नहीं, तथा आत्मसन्तोष की भावना से, सफलता की भावना से नहीं, कार्य करता है, वही समाज कल्याण में वास्तविक योगदान दे सकता है। कठोपनिषद् में व्यक्तियों द्वारा सम्पन्न किए जाने वाले सभी कार्यों को पेय्र एवं श्रेय की श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है। समाज कल्याण की दृष्टि से इस बात पर बल दिया गया कि व्यक्ति को अपने लिए प्रेय न होने के बावजूद भी श्रेय कायांरे को करना चाहिए। प्राचीन भारतीय विचारधारा के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को धर्म अर्थात् समाज के प्रति अपने निर्धारित कर्तव्यों का पालन करने के लिए कहा गया है जो एक लम्बी अवधि के दौरान व्यक्ति में आत्मविश्वास और शुद्धीकरण को लाते हुए उसका भी कल्याण करता है। इसके साथ ही साथ प्रत्येक व्यक्ति के स्वभाव में अच्छार्इयाँ तथा बुरार्इयाँ दोनों ही पायी जाती हं ै और इन दोनों ही प्रकार की शक्तियों में अन्तर्द्वन्द होता रहता है। अपनी तार्किक शक्ति का उपयोग करते हुए व्यक्ति बुरार्इयों पर काबू पाने का प्रयास करता है तथा अपने प्रयासों से समाज कल्याण में अपना योगदान देता है।

हिन्दू समाज में जीवन के लक्ष्यों के रूप में चार पुरुषार्थों-धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष का वर्णन किया गया है। इनमें से इहलौकिक अर्थ तथा काम की पूर्ति भी धर्म द्वारा निर्धारित होती है और अन्तिम उद्देश्य मोक्ष को चरम उत्कर्ष वाला माना जाता था और पहले तीनों लक्ष्यों का उद्देश्य चौथे लक्ष्य अर्थात् मोक्ष को प्रापत करना होता था। हमारे मनीषियों द्वारा कर्तव्यों के संपादन पर अधिक बल दिया गया है और पंच महायज्ञों का प्रावधान करते हुए विभिन्न प्रकार के ऋणों से छुटकारा पाने की बात कही गयी है। भारतवर्ष में सामाजिक न्याय की विचारधारा कभी भी व्यक्ति के अधिकारों पर केन्द्रित नहीं रही है बल्कि यह अन्य व्यक्तियों के प्रति अपने कर्तव्यों के प्रतिपादन पर आश्रित रही है।

इस प्रकार भारतवर्ष में त्याग की भावना पर हमेशा बल दिया गया है किन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं था कि व्यक्ति अकर्मण्य बन जाए। निष्काम कर्म का उपदेश इसीलिए दिया गया था ताकि व्यक्ति धर्म द्वारा निर्धारित सीमाओं के अधीन कार्य करते हुए इहलौकिक लक्ष्यों-अर्थ एवं काम की प्राप्ति कर सके। बुद्धिमान व्यक्तियों को निष्काम कर्म करने की सलाह सम्पूर्ण विश्व का हित करने के लिए दी गर्इ थी। भारतवर्ष में प्राचीन काल में कलयाण की अवधारणा केवल आवश्यकताग्रस्त वगांर् े तक ही सीमित नहीं थी बल्कि इसके विस्तार क्षेत्र में सभी वर्ग सम्मिलित थे। इसके साथ ही साथ कल्याण की अवधारणा शारीरिक अथवा भौतिक कल्याण तक ही सीमित नहीं थी और इसीलिए अनेकों ऐसे उदाहरण मिलते हैं जिनमें व्यक्ति अथवा समूह अपने साथियें की विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति नाना प्रकार के कार्य करते हुए करते थे जैसे कि कूँएं अथवा तालाब खुदवाना, विद्यालय खोलना, धर्मशालायें बनवाना, अस्पताल स्थापित करना, दार्शनिक विचार-विमर्श के लिए मठों की स्थापना करना, इत्यादि।समाज कल्याण की आवधारणा अत्यन्त प्राचीन है। निर्धनता, बीमारी, कष्ट आदि मानव जीवन में सदैव विद्यमान रहे है। प्रारम्भ में गिरोह तथा कबीलों के रूप में जीवन व्यतीत करता था। किन्तु यह जीवन आरक्षित एवं अव्यवस्थित था। फलस्वरूप समुदाय, समाज तथा राज्य के रूप में मनुष्य ने समष्टिगत व्यवस्था को जन्म दिया। इस व्यवस्था के परिणामस्वरूप समाज मेंविश्ेाषीकरण का विकास हुआ और श्रम विभाजन ने जन्म लिया। इस श्रम-विभाजन के कारण समाज में उत्पादन के साधन एक दूसरे से पृथक हो गये। श्रम और पूँजी दो पृथक व्यक्तियों के हाथ में चली गर्इ। इससे समाज में शोषण, उत्पीड़न तथा सम्पत्ति व शक्ति का असमान वितरण प्रारम्भ हुआ। असमान वितरण के कारण ही अनेक सामाजिक समस्याओं का जन्म हुआ और इन समस्याओं को हल करने के लिए समाज कल्याण का विकास हुआ।

इस प्रकार भारतीय परम्परा के अनुसार व्यक्ति का उद्देश्य स्वार्थ, लालच, तृष्णा जैसी पाशविक प्रवृत्तियों से नियन्त्रित सीमित व्यक्तिवाद को सम्पूर्ण मानव-मात्र की भलार्इ के लिए कार्यरत आत्मबोध कराने वाली सार्वभौमिकता में परिवर्तित करना था जो कि समाज कल्याण प्रशासन की प्रारम्भिक स्थिति कही जा सकती है।

समाज कल्याण प्रशासन समाज के प्रत्येक समाज कल्याण अभिकरण के सुचारू रूप से कार्य करने से सम्बन्धित है। इसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक, आर्थि, सांस्कृतिक तथा नैतिक विकास के लिए लोकतांत्रिक नियोजन के द्वारा कल्याणकारी समाज की स्थापना करना है। समाज कल्याण प्रशासन विकास नीति के प्रतिपादन में सहायता करता है। इसके साथ ही अनेक प्रमुख समाज कल्याण सेवाओं को समन्वित ढ़ग से नियोजित, व्यस्थित एवं कार्यान्वित करने में सहायता करता है। इन सेवाओं में राजकीय तथा स्वयंसेवी अभिकरणों का मिलकर कार्य करना भी शामिल है, यद्यपि विविध समाज कल्याण सेवाओं में इन दोनों का अनुपात भिन्न-भिन्न हो सकता है। इन सेवाओं को निम्न क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है:-

1. समाज सेवायें

(क) शिक्षा
इसके अन्तर्गत प्राथमिक, माध्यमिक, विश्वविद्यालय स्तरीय, तकनीकि व्यावसायिक, श्रमिक तथा सामाजिक शिक्षा सम्मिलित हैं। शिक्षा का समन्वय जनषक्ति नियोजन द्वारा होना चाहिए। शिक्षा मानव संसाधन के विकास में निवेश मानी जाने लगी है। यह एक प्रशंसनीय प्रगति है, परन्तु शिक्षा में सामाजिक मूल्यों तथा नैतिक विकास पर विशेष ध्यान देन की आवश्यकता है।

(ख) स्वास्थ्य सेवायें एवं परिवार नियोजन
स्वास्थ्य सेवाओं में चिकित्सकीय, निरोधात्मक तथा स्वस्थ्य वर्धक सेवायें आती है। जन्म दर में वृद्धि में विशेष कमी करने के लिउ परिवार नियोजन आवश्यक है। इस कार्य में स्वयंसेवी संस्थाओं का सहयोग निन्तात आवश्यक है। कृत्रिम साधनों के प्रयोग के साथ साथ संयम तथा नैतिक जीवन पर भी ध्यान देना चाहिए ताकि वह प्रयास पाश्चात्य देशों का अनुकरण मात्र ही बनकर न रह सके।

(ग) आवास
निम्न आय वाले वर्ग के लिए ऋणमुक्त अनुदान की व्यवस्था की जाती है क्योकि साधनों के अभाव के कारण आवास स्थिति में विशेष सुधार की आशा नही की जा सकती है। राज्य की और से भी कम मूल्य के आवास बड़ी संस्था में बनाये जा सकते है।

2. सामाजिक सुरक्षा

सामाजिक सुरक्षा को सुदढ़ बनाने के लिए सामाजिक बीमा का महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है। इन योजनाओं को एकीकृत करते हुए अधिक व्यापक बनाया जा सकता है। इससे निम्न आय वर्ग से प्राप्त धनराशि से योजना के साधनों में वृद्धि की जा सकती है। सामाजिक सहायता द्वारा वृद्धों, अबलाओं आदि को राज्य की ओर से आर्थिक सहायता दी जाती है। धन के आभाव के कारण इन सेवाओं को और अधिक व्यापक बनाने में अभी भी कठिनार्इ है। स्वयंसेवी संस्थायें इस ओर ध्यान दे तो अधिक साधन जुटाये जा सकते है।

3. सामुदायिक विकास

सामुदायिक विकास ग्रामीण तथा नगरीय दोनों स्तर पर होता है। इन दोनों स्तरों का एकीकृत कर एक व्यापक सामुदायिक विकास योजना के चलाये जाने की आवश्यकता है जिससे संतुलित विकास सम्भव हो सके।

4. श्रम सम्बन्ध

श्रमिक संघों की नियोजन की प्रक्रिया में सहभागिता आवश्यक है। राजकीय तथा निजी क्षेत्रों में प्रबंधकों और श्रमिकों के बीच मधुर सम्बन्ध स्थापित करते हुए उत्पादकता में वृद्धि की जा सकती है।

5. समाज कल्याण

अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा पिछड़ी जातियों की कल्याण योजनाओं का विस्तार किया जाना चाहिए जिससे इस वर्ग में भी एकीकरण हो सकें। शारीरिक रूप से बाधित जैसे अंधे, बधिर, अपाहिज, आदि के लिए कल्याणकारी योजनाओं का निर्माण होना चाहिए। समाज में इनके पुनस्र्थापन को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए। मानसिक रोगियों के लिए मानवता वादी समाज की व्यवस्था की जानी चाहिए तथा एक राष्ट्रवादी तथा एक राष्ट्रव्यापी मानव आरोग्य शास्त्र का विधिवत प्रचार किया जाना चाहिए। सामाजिक चेतना के रचनात्मक कार्यो से मानसिक स्वास्थ्य में वृद्धि हो सकती है।

6. सामाजिक रक्षा

वयस्क, युवा तथा बाल अपराधियों के लिए सुधार सम्बन्धी सेवाओं की व्यवस्था की जानी चाहिये। इसमें बन्दीगृह, प्रोबेशन, पुनर्वास आदि सेवायें आती है। अनैतिक व्यापार से पीड़ित लड़कियों तथा स्त्रियों के लिए नारी निकेतन तथा भिक्षुओं के लिए गृह स्थापित किये जाने 

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